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हादसे की पटरी

तमाम दावों के बावजूद रेल दुर्घटनाओं पर काबू पाना कठिन बना हुआ है। हर साल बजट में रेल को विश्व मानकों के अनुरूप सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने का दम भरा जाता है, ...
Author September 14, 2015 10:19 am

तमाम दावों के बावजूद रेल दुर्घटनाओं पर काबू पाना कठिन बना हुआ है। हर साल बजट में रेल को विश्व मानकों के अनुरूप सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने का दम भरा जाता है, पर स्थिति यह है कि पटरियां उखड़ जाने जैसे कमजोर पहलुओं को भी दुरुस्त कर पाने में कामयाबी नहीं मिल पाई है।

इसी का नतीजा है कि शिमला से कालका आ रही टॉय ट्रेन और सिकंदराबाद से मुंबई के बीच चलने वाली दुरंतो एक्सप्रेस के डिब्बे पटरी से उतर गए, जिससे दोनों घटनाओं में चार लोग मारे गए और कई घायल हो गए। हर बार की तरह प्रशासन ने घटनाओं की जांच के आदेश और घायलों तथा मृतकों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा करके अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ ली है। शिमला से कालका आ रही गाड़ी में विदेशी सैलानी सवार थे, जिसे उन्होंने विशेष रूप से अपने लिए आरक्षित करा रखा था।

कहा जा रहा है कि रफ्तार तेज होने की वजह से गाड़ी पटरी से उतर गई। भारतीय रेल की पटरियों की दशा किसी से छिपी नहीं है। उस पर जब भी कोई गाड़ी निर्धारित गति से तेज चल पड़ती है, उसकी फिश प्लेटें उखड़ जाती हैं। जिन रास्तों पर गाड़ियों की संख्या अधिक है, वहां क्षमता से अधिक बोझ और लगातार दबाव पड़ने की वजह से पटरियों के अपनी जगह से हिल या खिसक जाने का खतरा हमेशा बना रहता है।

मगर शिमला-कालका रेल लाइन पर इतनी अधिक गाड़ियां नहीं चलतीं। फिर यह भी कि पहाड़ी रास्ता होने की वजह से वहां गति आदि से संबंधित सावधानियां बरतने की दरकार हमेशा रहती है। फिर भी इस बात का ध्यान नहीं रखा गया तो इसे रेल महकमे की लापरवाही ही कहा जा सकता है।

रेलवे की स्थिति सुधारने पर जोर इसलिए भी दिया जाता रहा है कि इससे पर्यटन को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। मगर विडंबना यह कि एक तरफ बुलेट ट्रेन चलाने का खाका तैयार किया जा रहा है, तो दूसरी ओर भारतीय रेल की पटरियों को भरोसेमंद बनाने जैसे जरूरी मामलों में भी गंभीरता नहीं दिखाई जाती।

अनेक अध्ययनों से स्पष्ट है कि रेलवे की बहुत सारी पटरियों पर क्षमता से अधिक बोझ पड़ने से वे कमजोर पड़ गई हैं। अनेक पुल बहुत पहले अपनी मियाद पूरी कर चुके हैं, पर उनकी जगह नए पुल बनाने का काम अभी तक शुरू नहीं हो सका है। रेल के डिब्बे अब भी पुरानी तकनीक से तैयार किए जा रहे हैं, जबकि दूसरे देशों में आधुनिक तकनीक से तैयार होने वाले डिब्बे ज्यादा आरामदेह और सुरक्षित हैं।

गाड़ियों के संचालन में कंप्यूटर के इस्तेमाल, टक्कररोधी उपकरण लगाने, भरोसेमंद सिगनल प्रणाली आदि के उपयोग का दावा पिछले पच्चीस-तीस सालों से किया जा रहा है, पर इस दिशा में कोई बदलाव नजर नहीं आता। रेलवे की बहुत सारी परियोजनाएं बरसों से लटकी हुई हैं, जिसके चलते न सिर्फ जरूरत के मुताबिक गाड़ियां चलाने का मकसद पूरा हो पाता है, न सुरक्षा संबंधी उपायों को लागू कर पाने में मदद मिलती है। विकास की रफ्तार केवल राजमार्गों और हवाई मार्गों के जरिए नहीं हासिल की जा सकती, रेलवे को भी मजबूत बनाना होगा। उसकी दशा सुधारे बगैर खासकर पर्यटन को बढ़ावा देना मुश्किल बना रहेगा।

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