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मकसद और मिसाल

बिहार विधानसभा के चुनाव में गुजरात मॉडल बनाम बिहार मॉडल को लेकर भी थोड़ी बहस चली थी
Author November 27, 2015 23:48 pm

बिहार विधानसभा के चुनाव में गुजरात मॉडल बनाम बिहार मॉडल को लेकर भी थोड़ी बहस चली थी। पर चुनाव के बाद बिहार एक मामले में गुजरात की ही राह पर चल पड़ा है! एक और कार्यकाल के लिए चुने गए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को, मद्यनिषेध दिवस पर, पटना में हुए एक समारोह में एलान किया कि उनकी सरकार अगले साल एक अप्रैल से राज्य में शराबबंदी लागू करेगी। इस तरह उन्होंने अपना एक अहम चुनावी वादा पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है।

यह आम अनुभव की भी बात है और अनेक अध्ययन भी बताते हैं कि शराबखोरी का समाज पर बुरा असर पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा खमियाजा महिलाएं भुगतती हैं। कलह और हिंसा के अलावा शराब सेहत और पैसे की बर्बादी का भी जरिया बनती है। बच्चों का भविष्य बिगड़ता है। कई अध्ययन यह भी बताते हैं कि शराब की खपत बढ़ने का असर दुर्घटनाओं और अपराधों में बढ़ोतरी के रूप में भी होता है। नीतीश कुमार को महिला मतदाताओं का बड़े पैमाने पर समर्थन मिला तो शायद इसके पीछे शराबबंदी का उनका वादा ही था।

पर सवाल है कि क्या वे इस फैसले को व्यावहारिक रूप से सफल बना पाएंगे? यह सवाल इसलिए उठता है कि शराबबंदी की राह पर चलने वाले नीतीश पहले या अकेले मुख्यमंत्री नहीं हैं। कई राज्यों में इसकी पहल हुई और कुछ समय बाद वापस ले ली गई। कदम पीछे खींचने का एक कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का कमजोर पड़ जाना रहा होगा। पर व्यावहारिक कठिनाइयां भी रही होंगी। मसलन, यह देखा गया कि जहां शराबबंदी लागू हुई वहां चोरी-छिपे शराब की बिक्री होने लगी, अवैध शराब बनाने का धंधा पनपा। इसी के साथ क्रियान्वयन की जिम्मेवारी से जुड़े अफसरों और पुलिसकर्मियों की नाजायज कमाई के मौके भी बढ़ गए। इसलिए ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो नैतिक रूप से तो मद्यनिषेध के हामी हैं, पर इसकी व्यावहारिकता को लेकर शंकाशील रहते हैं।

फिलहाल शराबबंदी केवल गुजरात, नगालैंड और केंद्रशासित लक्षद्वीप में लागू है। गुजरात शायद अकेला उदाहरण है जहां राज्य के तौर पर इसके वजूद में आने के समय से यानी 1960 से शराब बनाने, बेचने, रखने और सेवन पर लगातार पाबंदी लगी रही है। लेकिन इस दिशा में पहल करने वाले कई राज्य पीछे हट गए। आंध्र प्रदेश में 1995 में, जब एनटी रामाराव का दूसरा कार्यकाल था, पूर्ण शराबबंदी लागू हुई थी। मगर दो साल बाद उनके उत्तराधिकारी चंद्रबाबू नायडू ने उस फैसले को पलट दिया।

तमिलनाडु में द्रमुक की सरकार ने 1971 में मद्यनिषेध लागू किया और तीन साल बाद वापस ले लिया था। एमजी रामचंद्रन ने 1981 में शराब से पाबंदी हटाई और 1987 में फिर से लगा दी। हरियाणा में बंसीलाल सरकार के दौरान जोर-शोर से लागू हुई शराबबंदी केवल दो साल रही थी। पीछे हट जाने की एक बड़ी वजह राजस्व में आई कमी रही होगी। अनुमान है कि बिहार सरकार को राजस्व के तौर पर चार हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना होगा। मगर राजस्व के नुकसान के बावजूद लाटरी बंद की गई

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