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जीएसटी का दंश

हाल में पहले टमाटर और फिर प्याज की कीमतें कई गुना चढ़ी हैं, पर इसका कारण जीएसटी नहीं है। इसी तरह, इनकी कीमतें फिर काबू में आ जाती हैं, तो वह भी जीएसटी की वजह से नहीं होगा।
Author August 8, 2017 05:13 am
दिल्ली में सब्जी बेचता एक विक्रेता। (फाइल फोटो)

माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के रूप में देश में जो नई कर-व्यवस्था एक जुलाई से लागू हुई, उसके पक्ष में जो खास-खास तर्क दिए जाते रहे हैं उनमें एक यह भी है कि इससे महंगाई घटेगी, या कम से कम काबू में रहेगी। अभी तक सरकारी आंकड़ों में ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि जीएसटी से महंगाई घटी है या बढ़ी है। पर आगे भी आंकड़ों के आधार पर महंगाई पर जीएसटी के ठीक-ठीक असर को शायद ही जाना जा सके। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के रूप में खुदरा बाजार में कीमतों की घट-बढ़ के जो आंकड़े आते रहते हैं वे उपभोग या खपत के लिहाज से समावेशी नहीं हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) में पचास फीसद हिस्सा खाद्य पदार्थों की कीमतों का होता है, जबकि खाद्य सामग्री को जीएसटी से बाहर रखा गया है। हाल में पहले टमाटर और फिर प्याज की कीमतें कई गुना चढ़ी हैं, पर इसका कारण जीएसटी नहीं है। इसी तरह, इनकी कीमतें फिर काबू में आ जाती हैं, तो वह भी जीएसटी की वजह से नहीं होगा।

टमाटर और प्याज की कीमतें तो हमारी कृषि अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना की ओर इशारा करती हैं। जब उपज का विक्रेता किसान रहता है, तब तो कीमतें एकदम अतार्किक रूप से कम रहती हैं, और जब उपज के विक्रेता दूसरे लोग हो जाते हैं तो कीमतें तेजी से चढ़ जाती हैं। बहरहाल, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जीएसटी के असर का ठीक अंदाजा न होने पाने की दूसरी वजह यह होगी कि इस सूचकांक में सेवाओं का मूल्य मोटे तौर पर नदारद है, जबकि देश में कुल निजी खपत के मूल्य में सेवाओं का हिस्सा पचास फीसद है। कुल निजी व्यय में सेवाओं पर होने वाले खर्च के इस अनुपात को देखते हुए और इस तथ्य के मद््देनजर कि नई व्यवस्था में सेवाओं पर कर की दर पहले के मुकाबले तीन फीसद अधिक है, अंदाजा लगाया जा सकता है कि जीएसटी का दंश कहां-कहां महसूस होगा। इसलिए सीपीआइ से अलग, यह देखना जरूरी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसे क्षेत्रों में ग्राहक को पहले से कम मूल्य चुकाना होगा, या अधिक? उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य के मद को लें। खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि जीएसटी के कारण लोगों को अब डायलिसिस कराने, पेसमेकर लगवाने, आर्थोपेडिक्स में सहायक उपकरणों और कैंसर उपचार के लिए अधिक खर्च करना पड़ सकता है। इसी तरह, हेपेटाइटिस की पहचान केलिए इस्तेमाल होने वाले उपकरण और रेडियोलॉजी मशीनों को छोड़ कर, डायग्नोस्टिक किट जीएसटी की सर्वोच्च श्रेणी यानी अट्ठाईस फीसद टैक्स के दायरे में आ गए हैं।

कर-निर्धारण के ये मामले बताते हैं कि जहां सबसे ज्यादा उदारता बरती जानी चाहिए थी, वहीं सबसे ज्यादा निर्ममता दिखाई गई है। यह दावा किया गया है कि जीएसटी से कर-आधार बढ़ेगा। ऐसे में, इतना टैक्स वहां लगाने की क्या जरूरत थी, जहां जीवन-मरण का प्रश्न है? बेतुकेपन और बेरहमी का एक और उदाहरण ट्रैक्टर है। यह किसी से छिपा नहीं है कि कृषिक्षेत्र और किसानों की क्या हालत है। ट्रैक्टर के खरीदार किसान होते हैं, जो खेती के घाटे का धंधा बन जाने के संकट से जूझ रहे हैं। फिर भी, ट्रैक्टर के विशेष कल-पुर्जों पर अट्ठाईस फीसद टैक्स तय किया गया। बहुत विरोध होने पर जीएसटी परिषद ने इसे घटा कर अठारह फीसद किया है। पर अब भी यह ज्यादा है। डायलिसिस, पेसमेकर और आर्थोपेडिक उपकरणों पर भी कर-दरें घटाई जानी चाहिए। सरकार को जीएसटी का श्रेय लूटने के बजाय इसे और तर्कसंगत बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

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