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जुर्माने के जरिए

आमतौर पर किसी त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान के बाद यमुना में बहती या उसके किनारों पर जमा पूजा सामग्री और विसर्जित मूर्तियों का अंबार देखा जा सकता है। नालों के रास्ते शहर की गंदगी और औद्योगिक कचरे के जहरीले रसायनों से मरती इस नदी के सामने लोगों की आस्था भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। […]
Author January 15, 2015 14:44 pm
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में फावड़े से गंगा नदी के घाटों के आसपास जमा गाद निकाल कर वहां ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की

आमतौर पर किसी त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान के बाद यमुना में बहती या उसके किनारों पर जमा पूजा सामग्री और विसर्जित मूर्तियों का अंबार देखा जा सकता है। नालों के रास्ते शहर की गंदगी और औद्योगिक कचरे के जहरीले रसायनों से मरती इस नदी के सामने लोगों की आस्था भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। मुश्किल यह है कि तमाम जागरूकता कार्यक्रमों और सरकार की ओर से नदी में कचरा न फेंकने के लिए चलाए जाने वाले अभियानों के बावजूद लोग समझने या मानने को तैयार नहीं दिखते। इसलिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने उचित ही सख्त रुख अख्तियार करते हुए यमुना में पूजा सामग्री डालते पाए जाने पर पांच हजार रुपए तक का जुर्माना लगाने का निर्देश दिया है। ‘मैली से निर्मल यमुना: पुनर्जीवन देने की योजना- 2017’ को हरी झंडी देते हुए हरित पंचाट ने यमुना के डूब क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण कार्य और नदी में मलबा डालने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। इन नियमों के उल्लंघन पर पचास हजार रुपए तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। यमुना को बचाने के लिए हरित पंचाट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक ने कई बार दिशा-निर्देश दिए हैं। लेकिन लापरवाही की प्रवृत्ति आम लोगों से लेकर सरकारी महकमों तक में पसरी हुई है।

यों, एक सभ्य और जागरूक समाज अपने आसपास अच्छी आदतों की संस्कृति को न केवल बढ़ावा देता, बल्कि इसके उलट कुछ होता देख उस पर अंगुली भी उठाता है। मगर हमारे यहां आमतौर पर लोग इस बात पर ध्यान नहीं देते या फिर जानबूझ कर अनदेखी करते हैं कि किसी की साधारण-सी दिखने वाली हरकत समाज के लिए कितनी बड़ी समस्या खड़ी कर रही है। घरों में पूजा-पाठ करने या इसके आयोजन के दौरान हम इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री को लेकर अधिकतम स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। लेकिन आयोजन खत्म होने के बाद ‘पवित्रता’ बचाए रखने के नाम पर उस सामग्री को बेहिचक आसपास की किसी नदी में प्रवाहित कर देते हैं। लापरवाही भरी यह आदत दूसरे कई मामले में भी आमतौर पर देखी जाती है। मसलन, लोग महंगी कार तो खरीद लेते हैं, लेकिन सड़क के किनारे जहां-तहां, पैदल यात्रियों के सड़क पार करने की जगहों पर भी ले जाकर खड़ी कर देने या रास्ते को बाधित करने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती। कारों के शीशे पर काली फिल्म नहीं लगाने का नियम होने के बावजूद लोग इसे धता बताने से नहीं चूकते। इस तरह की आदतों से निजात न मिलने की वजह यह भी है कि इन्हें रोकने के लिए जो नियम-कायदे और जुर्माने के प्रावधान हैं वे इतने आसान और मामूली हैं कि लोग उनकी परवाह नहीं करते। जुर्माना भर कर चलते बनते हैं।

इस लिहाज से यमुना में कचरा फेंकने पर भारी जुर्माने का निर्देश देकर हरित पंचाट ने उचित ही एक सख्त संदेश दिया है। सरकार ने इसी तर्ज पर सार्वजनिक जगहों पर सिगरेट पीते पाए जाने पर पहले के दो सौ रुपए के बजाय अब एक हजार रुपए जुर्माने की बात कही है। लेकिन आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि जो गतिविधियां एक सभ्य नागरिक की आदत में शामिल होनी चाहिए, उन्हें सुनिश्चित कराने के लिए सरकारों को जरूरी उपाय करने चाहिए, उसके लिए हरित न्यायाधिकरण जैसे निकाय को जुर्माने लगाने जैसे सख्त कदम उठाने पड़ते हैं? जागरूक, लेकिन अच्छी आदतों वाले एक सभ्य समाज के बिना अर्थव्यवस्था के सुहाने आंकड़े विकास का पर्याय नहीं हो सकते। इसके लिए सरकार और समाज, दोनों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।

 

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