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संपादकीयः बेतुका बयान

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का एक बयान विवाद का विषय बन गया तो यह स्वाभाविक है।
Author April 7, 2017 03:22 am
म्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला का एक बयान विवाद का विषय बन गया तो यह स्वाभाविक है। अब्दुल्ला ने बुधवार को श्रीनगर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए जो कहा, वह प्रकारांतर से पत्थरबाजी का महिमामंडन ही है। उन्होंने कहा कि पथराव करने वाले युवक अपनी जान पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि कश्मीर मसले को अपने लोगों की इच्छा के अनुरूप सुलझाने के लिए दे रहे हैं। इससे पहले, कश्मीर के अपने दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि घाटी के युवा टेररिज्म (आतंकवाद) को नहीं, टूरिज्म (पर्यटन) को चुनें। अब्दुल्ला संभवत: प्रधानमंत्री की टिप्पणी को निशाना बना रहे थे। अगर यह बस राजनीतिक वार और पलटवार का मामला हो, तो ऐसा राजनीति में चलता ही रहता है। पर फारूक अब्दुल्ला ने जो कहा, उससे कैसा संदेश गया होगा? क्या यह घाटी में शांति और स्थायित्व के पक्ष में है? मजे की बात है कि उनके बयान की आलोचना करने वाली पार्टियों में भाजपा के अलावा कांग्रेस भी है, जिसके साथ गठजोड़ कर फारूक श्रीनगर लोकसभा सीट का उपचुनाव लड़ रहे हैं।

विडंबना यह भी है कि जब वे मुख्यमंत्री थे तब सेना पर पत्थर फेंकने वाले उनकी निगाह में राष्ट्र-विरोधी तत्त्व थे जिनके साथ कड़ाई से निपटा जाना जरूरी था। जब राज्य की कमान उनके बेटे यानी उमर अब्दुल्ला के हाथ में थी, तब भी उनका यही रुख होता था। पर अब उनका रुख और लहजा बदला हुआ क्यों लग रहा है? शायद इसका कारण श्रीनगर उपचुनाव हो, जिसमें वे स्वयं उम्मीदवार हैं। उन्हें लगता होगा कि इस तरह की भाषा बोल कर वे अलगाववादियों का भी समर्थन जुटा लेंगे और कहीं ज्यादा वोट पा लेंगे। यह उपचुनाव राज्य की राजनीति में बहुत मायने रखता है, क्योंकि इससे पीडीपी-भाजपा गठबंधन की लोकप्रियता की परीक्षा होगी। हिज्बुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद महीनों तक पथराव का सिलसिला चला था। शायद इस उपचुनाव को उस घटना के बाद घाटी के मिजाज के संकेतक के रूप में भी देखा जाएगा। लेकिन हो सकता है कि फारूक के बयान के पीछे उपचुनाव के अलावा भी कुछ बात हो। एक समय पीडीपी अलगाववादियों के प्रति नरम रुख के लिए जानी जाती थी और इस वजह से वह भाजपा के निशाने पर रहती थी। पर भाजपा से गठबंधन के बाद अलगाववादियों का समर्थन वह खो चुकी है। हो सकता है फारूक पीडीपी की इस खोई हुई सियासी जमीन को पाना चाहते हों।

वे भाजपा-पीडीपी से मुकाबले के लिए जमात-ए-इस्लामी से सहयोग मिलने की इच्छा खुलेआम जता चुके हैं। जमात-ए-इस्लामी एक समय हुर्रियतकॉन्फ्रेंस का ही हिस्सा थी, और हुर्रियत के दो धड़ों में बंटने तक वह उसमें बनी रही। बहरहाल, असल सवाल यह है कि क्या एक ऐसे राजनेता को, जो राज्य का मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री भी रह चुका हो, ऐसी टिप्पणी करनी चाहिए जो सेना को नागवार गुजरे? दो माह पहले कश्मीर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ के दौरान नौ गोलियां खा चुके सीआरपीएफ के कमांडर चेतन चीता चमत्कारिक रूप से बच गए और अभी बुधवार को ही एम्स से बाहर आए हैं। उनकी पत्नी ने फारूक के बयान पर सख्त नाराजगी जताई है। अगर सेना के अलावा, घाटी के कोण से देखें, तब भी फारूक का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने जो कहा वह घाटी में शांति स्थापना का संदेश देता है, या गुमराह युवकों के अपकृत्य का औचित्य ठहराता है?

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