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किसान के आंसू

किसानों की आत्महत्या की घटनाएं अदालती संज्ञान का विषय बनी हैं। इस मसले पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा था।
Author नई दिल्ली | January 19, 2016 01:46 am
छिटपुट आत्महत्याएं तो पहले भी होती थीं, लेकिन 1990 के बाद से इसमें तेजी आ गई। (फाइल फोटो)

यह अच्छी बात है कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं अदालती संज्ञान का विषय बनी हैं। इस मसले पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा था। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने हलफनामा दायर कर कहा है कि सरकार विशेषज्ञों की समिति गठित करेगी, जो आठ साल पहले किसानों के लिए बनी राष्ट्रीय नीति पर गौर करेगी। यों यह आश्वासन भला मालूम पड़ता है, पर इससे शायद ही कुछ हासिल हो। आखिर विशेषज्ञ समिति की जरूरत क्या है? क्या किसानों की समस्याओं, उनके पीछे की वजहों से सरकार अनजान है? जिस समय किसान खुदकुशी कर रहे हों, सरकार को बताना चाहिए कि वह तात्कालिक रूप से क्या-क्या कदम उठाने जा रही है। पर उसने विचार-विमर्श की एक लंबी प्रक्रिया की तजवीज पेश की है। विशेषज्ञ समिति गठित होगी। साल-दो साल बाद वह अपनी रिपोर्ट देगी। उसके तथ्य यहां-वहां उद्धृत किए जाते रहेंगे, पर असल में शायद ही कुछ होगा। सरकार ने आठ साल पुरानी जिस नीति पर नए सिरे से गौर करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की बात कही है, वह नीति विख्यात कृषि विशेषज्ञ एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले आयोग की सिफारिशों के बाद बनी थी। आयोग ने बहुत विस्तृत रिपोर्ट दी थी। कृषि और किसानों से संबंधित एक भी पहलू उसमें छूटा नहीं। उसकी सिफारिशें सैद्धांतिक तौर पर स्वीकार की गर्इं। पर वे व्यावहारिक रूप से भी स्वीकार की जातीं, यानी उन्हें लागू भी किया जाता, तो आज किसानों की ऐसी दुर्दशा न होती कि सर्वोच्च अदालत को सरकार से जवाब तलब करने की जरूरत महसूस हो। एक नई विशेषज्ञ समिति गठित करने की क्या जरूरत है? केंद्र सरकार किसानों से किए अपने वादे को क्यों नहीं पूरा करती?

भाजपा ने लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में कहा था कि अगर वह सत्ता में आई तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक यह सुनिश्चित करेगी कि किसानों को उनकी उपज का लागत से डेढ़ गुना ज्यादा दाम मिले। पर सत्ता में आते ही अपने इस आश्वासन को भाजपा भूल गई। किसानों की खुदकुशी का सिलसिला वैसे ही जारी है जैसे यूपीए सरकार के समय था। ये घटनाएं पंजाब जैसे प्रांत में भी हो रही हैं जो हरित क्रांति का अगुआ राज्य रहा, और जिसकी छवि किसानों की बेहतर आर्थिक स्थिति वाले राज्य की रही है। पर अब पंजाब के भी किसान संकट में हैं, और अन्य राज्यों के भी। दरअसल, खेती घाटे का धंधा होती गई है। नतीजतन, खेती में लगे हुए लोग इसमें अपना और अपनी अगली पीढ़ियों का कोई भविष्य नहीं देख पाते और खुद को घोर हताशा में घिरा हुआ पाते हैं। किसानों के लिए राहत का अब तक का सबसे बड़ा कदम यही रहा कि रियायती ब्याज दर पर कृषि ऋण की सुविधा शुरू की गई। पर कृषि के लाभकारी न होने से कर्ज किसानों के गले का फंदा बनता गया है। अभी फसल बीमा की योजना घोषित हुई है। अच्छी पहल है। पर फसल बीमा योजना केवल बाढ़ या सूखे के मद्देनजर एक सीमित राहत की ही भूमिका निभा सकती है। किसानों को मुसीबत से उबारने का निर्णायक कदम यही हो सकता है कि खेती कैसे पुसाने लायक बने।

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