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आतंक के निशाने

कश्मीर घाटी में बीते शुक्रवार को बारह घंटों के भीतर एक के बाद एक हुए चार आतंकी हमलों से जहां आतंकवादी गुटों की नई सक्रियता का पता चलता है वहीं सुरक्षा के अभेद्य माने जा रहे इंतजामों पर भी सवालिया निशान लगा है। यों राज्य में आतंकवाद के लंबे इतिहास के बरक्स पिछले कुछ बरसों […]
Author December 8, 2014 11:55 am

कश्मीर घाटी में बीते शुक्रवार को बारह घंटों के भीतर एक के बाद एक हुए चार आतंकी हमलों से जहां आतंकवादी गुटों की नई सक्रियता का पता चलता है वहीं सुरक्षा के अभेद्य माने जा रहे इंतजामों पर भी सवालिया निशान लगा है। यों राज्य में आतंकवाद के लंबे इतिहास के बरक्स पिछले कुछ बरसों में स्थिति अपेक्षया सामान्य रही है। लेकिन हाल में घुसपैठ की नई कोशिशों के बारे में खुफिया एजेंसियां कई दफा आगाह कर चुकी थीं। क्या उस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया, या वह इतनी स्पष्ट नहीं थी कि खतरे का ठीक-ठीक अंदाजा लगाया जा सके? जो हो, पिछले सात-आठ साल में सीधे सुरक्षा बलों को निशाना बना कर किए गए ये सबसे भयानक हमले थे। इन हमलों ने एक लेफ्टिनेंट कर्नल समेत ग्यारह जवानों की जान ले ली। हमलावरों ने पुलिस और नागरिकों को भी निशाना बनाया। तीन पुलिसकर्मियों और दो नागरिकों की हत्या कर दी। अलबत्ता सभी हमलावरों को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया, पर तब तक हमलावर कहर बरपा चुके थे। उरी सेक्टर नियंत्रण रेखा के करीब होने के बावजूद आतंकवाद के चरम उभार के दिनों में भी महफूज रहा। एक तो अपनी विशेष भौगोलिक बनावट के चलते, और दूसरे, यहां फौज की सघन मौजूदगी के कारण। लेकिन इस बार आतंकी शायद कोहरे का फायदा उठा कर उरी में घुसे और सेना के मोहरा शिविर पर धावा बोल दिया। सेना के किसी ठिकाने पर पखवाड़े भर के भीतर यह दूसरा हमला था। शोपियां, श्रीनगर के सौरा और पुलवामा के त्राल में भी उन्होंने दहशतगर्दी मचाई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमले कितने सुनियोजित थे।

घाटी को दहला देने वाली ये घटनाएं ऐसे समय हुर्इं जब राज्य में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। दो चरण के मतदान हो चुके हैं जिनमें बहत्तर फीसद वोट पड़े। जाहिर है, मतदाताओं का यह उत्साह आतंकवादी संगठनों को रास नहीं आया होगा। तीसरे चरण में जिन सोलह विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होना है वे सभी घाटी मेंहैं। निश्चय ही इन हमलों का मकसद चुनाव प्रक्रिया में खलल डालना और मतदाताओं को भयभीत करना रहा होगा। पर हो सकता है आतंकवादी गुटों की मंशा चुनावी तैयारियों को बाधित करने और मतदाताओं में भय का संचार करने के साथ ही पाकिस्तान से तनाव बढ़ाने की भी रही हो। गौरतलब है कि जिस दिन ये हमले हुए उसी दिन लश्कर-ए-तैयबा के सरपरस्त हाफिज सईद ने जमात-उद-दावा के बैनर तले लाहौर में रैली कर भारत के खिलाफ एक बार फिर जहर उगला। खबर यह भी है कि इस रैली के लिए वहां विशेष ट्रेन की सुविधा दी गई। इससे हाफिज सईद पर पाकिस्तान के राज्यतंत्र की मेहरबानी का ही संकेत मिलता है।

जब भी आतंकवाद की बाबत पाकिस्तान के रुख पर सवाल उठते हैं, वह अमेरिका की अगुआई वाले अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी गठबंधन में अपनी साझेदारी का हवाला देता है। लेकिन यह सफाई कितनी विश्वसनीय है, जब वह जमात-उद-दावा को रैली करने की इजाजत देता है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध है? बहरहाल, यह सही है कि दहशतगर्दी के लिए आतंकवादियों ने चुनाव का समय सुनियोजित रूप से चुना होगा, पर चुनाव बीतने के साथ उनके निष्क्रिय हो जाने की उम्मीद पालना काफी जोखिम भरा हो सकता है। अगले महीने गणतंत्र दिवस पर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत के मेहमान होंगे। उस मौके को ध्यान में रख कर भी आतंकवादी गुट दहशत फैलाने की योजना बना सकते हैं। यानी आने वाले दिनों में न सिर्फ घाटी में, बल्कि बाकी देश में भी आतंकी खतरों के प्रति सजग रहने की जरूरत है।

 

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