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अर्थव्यवस्था की सूरत

जब देश की अर्थव्यवस्था के बारे में पिछली तिमाही के आंकड़े आए थे, तो सरकार श्रेय लेने के लिए उतावली दिख रही थी। लेकिन इस बार उसकी प्रतिक्रिया ठंडी थी। वजह साफ है। पिछली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट दर्ज हुई है। अप्रैल से जून के बीच जहां आर्थिक […]
Author December 1, 2014 11:57 am
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जब देश की अर्थव्यवस्था के बारे में पिछली तिमाही के आंकड़े आए थे, तो सरकार श्रेय लेने के लिए उतावली दिख रही थी। लेकिन इस बार उसकी प्रतिक्रिया ठंडी थी। वजह साफ है। पिछली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट दर्ज हुई है। अप्रैल से जून के बीच जहां आर्थिक विकास दर 5.7 फीसद थी, वहीं जुलाई से सितंबर के बीच यह 5.3 फीसद पर आ गई। यों सरकार ने और कई आर्थिक विशेषज्ञों ने भी ताजा आंकड़ों को संतोषजनक कहा है, इस आधार पर कि ये आंकड़े पहले जताए गए कुछ अनुमानों से बेहतर हैं। अनुमान किया जा रहा था कि दूसरी तिमाही की जीडीपी दर पांच फीसद के आसपास हो सकती है। तसल्ली की दूसरी वजह यह है कि ताजा आंकड़े पिछले साल की पहली छमाही के बरक्स भी अच्छे कहे जा सकते हैं। बीते वित्तवर्ष में अप्रैल से सितंबर के बीच विकास दर 4.9 फीसद थी, जबकि इस साल की पहली छमाही में यह साढ़े पांच फीसद रही। फिर भी कई बातें ऐसी हैं जो चिंताजनक हैं। कृषि और विनिर्माण, ये दो क्षेत्र रोजगार के सबसे बड़े स्रोत हैं। लेकिन ताजा आंकड़ों में इन दो क्षेत्रों ने निराश किया है। औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर इस साल जुलाई से सितंबर के दौरान सिमट कर 0.1 फीसद पर आ गई, जबकि इससे पहले की तिमाही में यह साढ़े तीन फीसद थी। कृषि की विकास दर पहली तिमाही में 3.8 फीसद थी, जो दूसरी तिमाही में कम होकर 3.2 फीसद हो गई।

जाहिर है कि विनिर्माण पर मेक इन इंडिया नाम से खासा जोर देने की सरकार की नीति ताजा आंकड़ों में प्रतिबिंबित नहीं होती है। कृषि क्षेत्र में पिछली तिमाही के मुकाबले कोई खास गिरावट दर्ज नहीं हुई है, पर जो अधिक चिंता की बात है वह यह कि देश में खेती का रकबा कम होता जा रहा है। दूसरी तिमाही की विकास दर के साथ ही राजकोषीय घाटे की भी ताजा स्थिति सामने आई है। सरकार ने राजकोषीय घाटे पर काबू पाने का जो लक्ष्य तय किया था वह हाथ से निकलता दिखाई दे रहा है। राजकोषीय घाटा अक्तूबर के अंत तक बजट अनुमान के स्तर को पहले सात महीनों में ही पार कर गया है। यानी मौजूदा वित्तवर्ष के बाकी बचे समय में इसे निर्धारित लक्ष्य के दायरे में ला पाना सरकार के लिए लगभग असंभव हो चुका है। यों इस वक्त सरकार और अर्थव्यवस्था के लिए कई अनुकूल स्थितियां हैं। मसलन, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम पिछले चार साल के न्यूनतम स्तर पर हैं, जिसके फलस्वरूप मुद्रास्फीति की दर में गिरावट आई है। शेयर बाजार रिकार्ड ऊंचाई पर है; बीते शुक्रवार को मुंबई शेयर बाजार का कुल बाजार पूंजीकरण सौ लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया। लेकिन दूसरी ओर, राजकोषीय घाटा 1998-99 के बाद आज उच्चतम स्तर पर है।

इसका साफ मतलब है कि सरकार को कर-राजस्व अपेक्षा से काफी कम मिल पा रहा है, अप्रत्यक्ष करों में यह स्थिति और भी शोचनीय है। एक वजह औद्योगिक उत्पादन में आई गिरावट हो सकती है। पर करों की वसूली में ढिलाई या इच्छाशक्ति की कमी से भी इनकार नहीं किया जा सकता। जब भी राजकोषीय घाटे को लेकर सरकार हरकत में आती है, सरकारी खर्चों में कमी लाने के कुछ निर्देश जारी किए जाते हैं। कुछ समय बाद वे निर्देश किसी को याद नहीं रहते। पर इससे भी ज्यादा खटकने वाली बात यह है कि न करों की वसूली में सख्ती बरती जाती है न बैंक-कर्जों के बड़े बकाए वसूलने की मुहिम चलती है। सरकारी बैंकों के बड़े बकाएदारों पर पांच लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने इस पर चिंता जताई है, पर सरकार क्यों खामोश है?

 

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