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राजधानी की हवा

दिल्ली की हवा के लगातार प्रदूषित होते जाने पर पिछले डेढ़ दशक के दौरान पर्यावरणविदों ने बार-बार चिंता जताई, सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दिशा-निर्देश भी जारी हुए। लेकिन स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती ही गई है। विडंबना यह है कि जब यह मसला अदालत में होता है और वहां सरकार से जवाब मांगे जाते […]
Author December 1, 2014 11:55 am

दिल्ली की हवा के लगातार प्रदूषित होते जाने पर पिछले डेढ़ दशक के दौरान पर्यावरणविदों ने बार-बार चिंता जताई, सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दिशा-निर्देश भी जारी हुए। लेकिन स्थिति सुधरने के बजाय बिगड़ती ही गई है। विडंबना यह है कि जब यह मसला अदालत में होता है और वहां सरकार से जवाब मांगे जाते हैं तो हर बार एक रटा-रटाया आश्वासन दोहरा दिया जाता है कि इस संबंध में जल्द कदम उठाए जाएंगे। लेकिन वास्तव में होता कुछ नहीं। नतीजतन पिछले कुछ सालों में दिल्ली में वायु प्रदूषण कई गुना बढ़ गया है। बीते शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान जब अदालत-कक्ष में वायु प्रदूषण का स्तर मापा गया तो वह सुरक्षित मानकों से चार गुना ज्यादा निकला।

इसी संदर्भ में पिछले हफ्ते राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने राजधानी की सड़कों पर पंद्रह साल से ज्यादा पुराने वाहन हटाने के निर्देश जारी किए थे। शुक्रवार को एक बार फिर सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए हरित पंचाट ने कहा कि सर्वोच्च अदालत के आदेशों के बावजूद दिल्ली समेत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा की हालत में शायद ही कोई सुधार हुआ है; यह स्थिति और ज्यादा दिनों तक कायम रहने की इजाजत नहीं दी जा सकती। पंचाट ने इस मसले पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय सहित दिल्ली की तेरह सरकारी एजेंसियों को नोटिस जारी किया। इसके अलावा, दिल्ली की हवा को स्वच्छ बनाने के लिए न्यायाधिकरण ने खुले में प्लास्टिक और पेड़ के पत्ते जलाने को दंडनीय बनाने, निर्बाध यातायात सुनिश्चित करने, कार-पूल को बढ़ावा देने और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने सहित कुल चौदह बिंदुओं पर अमल का निर्देश दिया।

दिल्ली की हवा को प्रदूषित करने में सबसे ज्यादा भूमिका वाहनों की है। राजधानी में लगभग इक्यासी लाख पंजीकृत वाहन हैं, जिनमें से निजी गाड़ियों की तादाद साठ लाख के आसपास है। कहीं आने-जाने के लिए निजी वाहनों का उपयोग करने वालों में ऐसे तमाम लोग हैं जो सार्वजनिक परिवहन से सफर करना चाहते हैं। अगर किसी को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए ठीक समय पर बसें मिल जाएं तो बहुत सारे लोग इनका उपयोग कर सकते हैं। लेकिन दिल्ली में मेट्रो ट्रेन को छोड़ दिया जाए तो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। अगर निजी वाहनों का आकर्षण कम करना है और सड़कों पर गाड़ियों की बेलगाम तादाद पर काबू पाना है तो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह भरोसेमंद और समयबद्ध बनाए बिना यह संभव नहीं है।

मुश्किल यह है कि अदालती आदेशों के बावजूद सरकार के टालमटोल भरे रवैए में कोई फर्क नहीं पड़ता है। खबरों के मुताबिक हाल में जब हरित पंचाट ने सड़कों से पंद्रह साल से ज्यादा पुराने वाहन हटाने का आदेश जारी किया तो संबंधित महकमों के अधिकारियों का कहना था कि इस पर अमल से काफी दिक्कतें पैदा होंगी। सवाल है कि दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को सरकार कितनी गंभीरता से लेती है और अदालती फैसलों का उसकी नजर में कितना महत्त्व है! कायदे से पर्यावरण में घुलते जहर को लेकर सरकार को खुद ही सचेत रहना चाहिए और समय पर अपनी ओर से सख्त कदम उठाने चाहिए। लेकिन अब यह अदालतों को तय करना पड़ रहा है कि सरकार को वायु प्रदूषण से निपटने के लिए क्या-क्या करना चाहिए!

 

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