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संपादकीयः दुर्दशा के कारागार

भारतीय जेलों में अव्यवस्था और बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहारों पर चिंता जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर जेल सुधार की दिशा में कड़े निर्देश जारी किए हैं।
Author September 16, 2017 03:02 am
(express Photo)

भारतीय जेलों में अव्यवस्था और बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहारों पर चिंता जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर जेल सुधार की दिशा में कड़े निर्देश जारी किए हैं। सर्वोच्च अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों से कहा कि वे 2012 से 2015 के बीच जेलों में हुई अस्वाभाविक मौतों का संज्ञान लेते हुए खुद जनहित याचिका दर्ज करें और उनके लिए मुआवजा दिलाने का प्रबंध करें। कैदियों, खासकर पहली बार अपराध करने वालों के परामर्श के लिए काउंसलर और सहायक कार्मिक नियुक्त किए जाएं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भी अदालत ने निर्देश दिया है कि हिरासत या संरक्षण में रखे गए बच्चों की हुई अस्वाभाविक मौतों की सूची तैयार करे और उनके लिए संबंधित राज्य सरकारों से विचार-विमर्श करे। जेलों में व्याप्त अमानवीय स्थितियों में सुधार के उपाय किए जाएं। पहले भी अनेक मौकों पर जेल सुधार की मांग उठती रही है, मगर इस दिशा में उल्लेखनीय कदम अब तक नहीं उठाए जा सके हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्देश का कहां तक पालन हो पाएगा, देखने की बात है।

छिपी बात नहीं है कि जेलों में उनकी क्षमता से कहीं अधिक कैदी रखे गए हैं। इसके चलते कौदियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। उनके स्वास्थ्य, भोजन आदि पर समुचित ध्यान न दिए जाने या फिर उनके साथ अमानवीय व्यवहार के चलते अक्सर कई अस्वाभाविक मौत के शिकार हो जाते हैं। इन मौतों को आमतौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्देश के बाद शायद जेलों में कुछ सतर्कता बरती जा सके। जेलों पर कैदियों के बढ़ते बोझ का एक बड़ा कारण मुकदमों का लंबे समय तक लटके रहना है। जेलों में बंद लगभग आधे से अधिक कैदी ऐसे हैं, जिन पर बहुत मामूली अपराध के आरोप हैं। बहुत सारे विचाराधीन कैदी फैसले के इंतजार में सलाखों के पीछे रहने को मजबूर हैं। अनेक कैदी फैसला आने तक अपराध में तय सजा से कहीं अधिक कारावास भुगत चुके होते हैं। कई ऐसे होते हैं, जिन्हें मामूली जुर्माना लगा कर बरी किया जा सकता था, पर वे विचाराधीन कैदी के रूप में कारावास की सजा भुगतने को बाध्य होते हैं।

ऐसे में पहली बार अपराध करने वालों या मामूली अपराध करने वालों के लिए परामर्श की व्यवस्था का सुझाव स्वागत योग्य है।
अदालतों में मुकदमों के लंबे समय तक लटकने की बड़ी वजह जजों के खाली पदों का न भरा जाना है। इस पर लंबे समय से चिंता जाहिर की जाती रही है। कई मुख्य न्यायाधीश सेवामुक्त होते समय इस तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित कर चुके हैं। विधि आयोग भी कई बार सिफारिश कर चुका है कि जजों के खाली पद जितनी जल्दी हो सके, भरे जाने चाहिए, क्योंकि आबादी के अनुपात में हमारे यहां जजों की संख्या बहुत कम है। मगर इस तरफ ध्यान दिए जाने के बजाय सेवामुक्त जजों की सेवा लेने, दो पाली में अदालतें चलाने और लोक अदालतें लगाने जैसे उपाय आजमाए गए, पर इससे मुकदमों का अंबार कम नहीं हुआ। संगीन अपराधों के अलावा मामूली अपराधों में फैसला कम समय में सुनाया जा सकता है, पर जजों की संख्या पर्याप्त न होने के कारण वे लंबे समय तक लटके रहते हैं। अगर मुकदमों का शीघ्र निपटारा होने लगे तो जेलों पर बोझ अपने आप कम जाएगा और इस तरह अस्वाभाविक मौतों और बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार पर भी अंकुश लग पाएगा।

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