June 26, 2017

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संपादकीयः अर्थव्यवस्था की तस्वीर

इस वक्त अर्थव्यवस्था का क्या हाल है, यह सवाल राजनीतिक कोण से भी अहम है।

Author April 14, 2017 03:23 am

इस वक्त अर्थव्यवस्था का क्या हाल है, यह सवाल राजनीतिक कोण से भी अहम है। पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का एक खास वादा यह था कि वह सत्ता में आई तो ‘नीतिगत पक्षाघात’ की स्थिति से निजात दिलाएगी और अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज करेगी। अब जबकि केंद्र की सत्ता में उसे आए तीन साल होने को हैं, अर्थव्यवस्था की तस्वीर सुनहरी नहीं है, उलटे चिंताजनक है। ताजा आंकड़े एक तरफ आइआइपी यानी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में गिरावट के आए हैं, तो दूसरी तरफ महंगाई में बढ़ोतरी के। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में आइआइपी में 1.2 फीसद की गिरावट आई, जो कि पिछले चार महीनों का सबसे खराब प्रदर्शन है। दूसरी तरफ खुदरा महंगाई मार्च में, पांच महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। इस साल फरवरी से पहले, औद्योगिक उत्पादन में सबसे बड़ी गिरावट पिछले साल अक्तूबर में हुई थी, 1.87 फीसद। आइआइपी की ताजा गिरावट में सबसे बड़ा योगदान विनिर्माण क्षेत्र यानी मैन्युफैक्चरिंग के खराब प्रदर्शन का है। फरवरी में मैन्युफैक्चरिंग दो फीसद सिकुड़ा है। मैन्युफैक्चरिंग आइआइपी का सबसे बड़ा हिस्सा है, पचहत्तर फीसद से भी कुछ अधिक। इसलिए मैन्युफैक्चरिंग की हालत खस्ता होने का मतलब है अधिकांश औद्योगिक उत्पादन की हालत खस्ता होना। यही नहीं, कृषि के बाद मैन्युफैक्चरिंग ही रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र है। इसलिए मैन्युफैक्चरिंग में गिरावट रोजगार के लिहाज से भी चिंताजनक है।

अब निवेश की दृष्टि से देखें। पूंजीगत सामान के उत्पादन को नए निवेश का पैमाना समझा जाता है, पर पूंजीगत सामान के उत्पादन में 3.4 फीसद की कमी दर्ज हुई है। इसी तरह, घरेलू मांग को दर्शाने वाले टिकाऊ और गैर-टिकाऊ उपभोक्ता सामान, दोनों के उत्पादन का ग्राफ गिरा है। अगर पिछले साल अप्रैल से फरवरी तक की स्थिति देखें, तो औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर आधा फीसद से भी कम रही। इस साल फरवरी में आइआइपी के चार माह के निम्नतम स्तर पर रहने के आंकड़े तब आए हैं जबकि आम अनुमान बढ़ोतरी का था। अब महंगाई को लें। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई मार्च में 3.81 फीसद पर पहुंच गई, जो कि फरवरी में 3.65 फीसद पर रही थी। ताजा आंकड़ा पांच महीनों का उच्चतम स्तर है। इससे रिजर्व बैंक का अनुमान या अंदेशा सही निकला है, जिसने महंगाई का ही खयाल कर, पिछली मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरों को यथावत रखा।

महंगाई में ताजा इजाफे के पीछे र्इंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। अगर यह सच है, तो आने वाले दिनों में महंगाई से राहत मिल पाने के फिलहाल कोई संकेत नहीं हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी के ही रुझान दिख रहे हैं। नोटबंदी के पीछे एक दावा यह भी किया गया था कि इससे महंगाई पर काबू पाने में मदद मिलेगी। लेकिन खुदरा महंगाई में लगातार दूसरे महीने तेजी दर्ज की गई है, जिससे नोटबंदी के समय किए गए दावे पर सवालिया निशान लग गया है। फिर, मोदी सरकार का एक बड़ा वादा रोजगार से जुड़ा था, हर साल दो करोड़ नए रोजगार देने का। लेकिन श्रम ब्यूरो की तीन रिपोर्टें बताती हैं कि वादे और असलियत के बीच काफी दूरी है। जब बैंक-ऋण में ठहराव हो, आइआइपी में सिकुड़न हो, निर्यात लुढ़क गया हो, तो रोजगार-वृद्धि की उम्मीद भी कैसे की जाए!

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First Published on April 14, 2017 3:23 am

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