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संपादकीयः सेहत की सुध

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर क्या है, यह सभी जानते हैं। शायद ही कभी देश में जन-स्वास्थ्य कोई मुद््दा बना हो और सरकारों की चिंता में वे लोग शुमार हुए हों जो अच्छी और जरूरी चिकित्सा से वंचित रहते हैं।
Author March 18, 2017 03:29 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर क्या है, यह सभी जानते हैं। शायद ही कभी देश में जन-स्वास्थ्य कोई मुद्दा बना हो और सरकारों की चिंता में वे लोग शुमार हुए हों जो अच्छी और जरूरी चिकित्सा से वंचित रहते हैं। लेकिन गुरुवार को मंत्रिमंडल ने जिस नई स्वास्थ्य नीति, 2017 को मंजूरी दी, उससे कुछ बेहतर की उम्मीद की जानी चाहिए। नई नीति में एक अहम बिंदु यह है कि बीमारियों के इलाज के बजाय उनसे बचाव पर ज्यादा जोर दिया जाए। पर सवाल यह है कि इस आग्रह को कार्यरूप में कैसे परिणत किया जाएगा। देश में नवजात शिशुओं, प्रसव के बाद माताओं और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर लंबे समय से एक गंभीर समस्या रही है। नई नीति में इसे कम करने का घोषित लक्ष्य अगर जमीन पर उतर सका तो यही अपने आप में विश्व स्वास्थ्य सूचकांक में देश की स्थिति में सुधार कर सकेगा। औसत जीवन प्रत्याशा को बढ़ा कर सत्तर साल करने के अलावा, कालाजार, कुष्ठ और क्षय रोग के उन्मूलन तथा कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग आदि से होने वाली मौतों की दर को 2025 तक घटाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

अब तक सबसे ज्यादा चिंता इस बात पर जाहिर की जाती रही है कि आखिर किन वजहों से सरकारें स्वास्थ्य के मद में इतनी कम राशि तय करती हैं। शायद इसी के मद््देनजर अब सरकार ने स्वास्थ्य खर्च को जीडीपी के 1.16 फीसद से समयबद्ध तरीके से बढ़ा कर 2.5 फीसद तक करने का फैसला किया है। यह छिपी बात नहीं है कि इतने बड़े देश में फैली आबादी और अलग-अलग इलाके में स्वास्थ्य के मामले में भिन्न जरूरतों के मद्देनजर इससे निपटने के लिए कितनी व्यवस्था रही है। चिकित्सकों की कमी, सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं है। जाहिर है, इसके मूल में वजह जरूरत के अनुपात में बहुत कम राशि का आबंटन रही है, जिसका असर समूची स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है। इसलिए अगर सरकार ने स्वास्थ्य-खर्च को जीडीपी के ढाई फीसद तक ले जाना तय किया है तो यह स्वागतयोग्य है। सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए निजी-सरकारी भागीदारी पर जोर देने की बात कही है। उसके पास एक व्यापक सुगठित तंत्र होता है जो व्यवस्था और सेवा के मोर्चे पर योजनाबद्ध तरीके से काम करता है। लेकिन अगर सरकार को लगता है कि बेहतर व्यवस्था के लिए निजी क्षेत्र के साथ भागीदारी जरूरी है तो उसे यह भी ध्यान रखना चाहिए कि निजी क्षेत्र की अमूमन हर गतिविधि का आधार मुनाफा होता है और कहीं उसकी आंच कमजोर तबकों को न झेलनी पड़े। यह नहीं भूलना चाहिए कि निजी क्षेत्र ने जहां चिकित्सा सेवाओं की मौजूदगी बढ़ाई है वहीं उन्हें महंगा भी बनाया है।

इस लिहाज से देखें तो स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने नई स्वास्थ्य नीति घोषित करते हुए वंचितों और गरीबों के साथ देश के सभी वर्गों को सस्ती दरों पर गुणवत्तायुक्त स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने की बात कही है, उससे उम्मीद बंधती है। नई नीति को सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक ऐतिहासिकपहलकदमी बता रही है। लेकिन किसी पहल की अहमियत आखिरकार अमल के नतीजों से साबित होती है। इसलिए यह देखना होगा कि अब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकारों की जो उदासीनता रही है, क्या वही सिलसिला बना रहता है या उसमें कुछ बदलाव आता है।

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