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संपादकीयः चुनाव में बजट

यह सामान्य परिपाटी-सी बन गई है कि जब कोई चुनाव आने वाला होता है तो सरकारें लोगों को लुभाने के मकसद से बजटीय प्रावधान पेश करती हैं।
Author March 10, 2017 02:58 am
बजट पेश करने जाते उपमुख्यमंत्री सिसोदिया।

यह सामान्य परिपाटी-सी बन गई है कि जब कोई चुनाव आने वाला होता है तो सरकारें लोगों को लुभाने के मकसद से बजटीय प्रावधान पेश करती हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर केंद्रीय बजट से भी कुछ ऐसी ही उम्मीद की जा रही थी, मगर उसमें ऐसा करने से बचा गया। पर दिल्ली सरकार ने अपने बजट में जैसे प्रावधान किए हैं, उन पर आने वाले नगर निगम चुनावों की छाया साफ दिखाई देती है। इसी तरह राजस्थान सरकार के बजट पर भी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का दबाव स्पष्ट है। दिल्ली सरकार ने करों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है, बल्कि कुछ करों में भारी कटौती की गई है। पिछले साल उसने इकतालीस हजार दो सौ करोड़ रुपए का बजट पेश किया था, जबकि इस बार अड़तालीस हजार करोड़ रुपए यानी साढ़े सोलह फीसद अधिक का बजट पेश किया गया है। इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में अधिक खर्च रखा गया है, जो कि आम आदमी पार्टी की प्राथमिकता सूची में शामिल हैं।

इसी तरह राजस्थान सरकार ने अपने बजट में कई तरह की लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की है। मेधावी छात्राओं को स्कूटी देने, हर ग्राम पंचायत में नया पशु चिकित्शालय बनाने, कपड़ा उद्योग में आयात-निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए केंद्र खोलने, एक हजार किलोमीटर तक राजमार्गों का विस्तार करने और बेरोजगारी भत्ते में बढ़ोतरी आदि का प्रावधान किया गया है। दिल्ली सरकार ने भी बेरोजगारों, दिव्यांग आदि को मिलने वाले भत्तों में बढ़ोतरी की है। व्यापारियों को लुभाने के लिए वैट की दर घटा दी गई है। भवन निर्माण सामग्री और सेनेट्री नैपकीन जैसी वस्तुओं पर लागू कर आधे से भी कम कर दिए गए हैं। इससे यह तो तय है कि अगले वित्त वर्ष में दिल्ली और राजस्थान के लोगों को करों में कुछ राहत मिलेगी, पर बजट में जिन योजनाओं की घोषणा की गई है, उनमें से कितनी सिरे चढ़ पाएंगी, देखने की बात होगी।

अक्सर देखा गया है कि चुनाव के मद्देनजर सरकारें आक्रामक ढंग से रियायतों और योजनाओं की घोषणाएं कर देती हैं, पर चुनाव बाद जैसे उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं रहता। अगर सरकार बदल गई, तो नई सरकार उन योजनाओं को आगे बढ़ाने के बजाय अपने ढंग से योजनाएं बनाती और क्रियान्वित करने की कोशिश करती है। राजस्थान सरकार ने राजमार्गों के विकास, हर पंचायत में पशु चिकित्सालय खोलने जैसी योजनाओं की घोषणा तो कर दी है, पर अगले एक साल में ये काम शायद ही पूरे हो पाएं। दिल्ली सरकार के पास अभी करीब तीन साल का कार्यकाल बचा है, इसलिए अगर वह अपने किए वादे पूरे नहीं कर पाई, तो लोग उससे सवाल पूछेंगे। मगर राजस्थान सरकार पर ऐसा कोई दबाव नहीं होगा। फिर कई रियायतों का नतीजा यह होता है कि सरकार को भारी राजस्व का दबाव झेलना पड़ता है। इसके चलते अगले बजट में सरकारें लोगों पर करों का बोझ लादने का फैसला करती हैं। समझना कठिन है कि सरकारों को जब चुनाव सिर पर होता है, तभी लोककल्याणकारी कार्यों की याद क्यों आती है। अगर वे संतुलित बजट तैयार कर कामकाज में पारदर्शिता बरतें तो पांच साल के कार्यकाल में बहुत सारी योजनाओं को सिरे चढ़ाया जा सकता है, पर ऐसा नहीं हो पाता। सो, वे अपनी जवाबदेही से ध्यान हटाने के लिए चुनाव के समय वाले बजट में लोकलुभावन वादे करती हैं।

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