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संपादकीयः खरीदार की सुध

रीयल एस्टेट के कारोबरियों और बिल्डरों की मनमानी पर लगाम लगाने में केंद्र और राज्य सरकारें विफल रही हैं।
Author June 16, 2017 03:01 am

रीयल एस्टेट के कारोबरियों और बिल्डरों की मनमानी पर लगाम लगाने में केंद्र और राज्य सरकारें विफल रही हैं। ऐसे में राष्ट्रीय उपभोक्ता वाद निवारण आयोग का एक फैसला खरीदारों को राहत देने वाला है। आयोग ने बिल्डरों और खरीदारों के बीच होने वाले करार पर सवाल उठाया है। आयोग ने टिप्पणी की है कि करार बिल्डरों के पक्ष में रहता है, जिसकी वजह से वे मनमानी करते हैं और खरीदारों को आर्थिक क्षति पहुंचाते हैं। आयोग के बीसी गुप्ता की अध्यक्षता वाले पीठ ने कानपुर विकास प्राधिकरण से कहा है कि वह करार के मुताबिक भूखंड देने में विफल रहने पर दोनों खरीदारों को करीब नौ लाख रुपए का ब्याज अदा करे। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब बिल्डर भुगतान में देरी करने पर खरीदार से 18 से 24 फीसद ब्याज वसूलते हैं तो जब खामी उनकी तरफ से होती है तो यही नियम उन पर क्यों नहीं लागू होना चाहिए! दोनों खरीदारों ने 2005 में भूखंड खरीदने के लिए प्राधिकरण के पास 1.53 करोड़ रुपए जमा किए थे। प्राधिकरण ने कानपुर की दीवानी अदालत के एक आदेश की वजह से दोनों खरीदारों का आबंटन निरस्त कर दिया और बिना किसी ब्याज के उनकी राशि लौटा दी। खरीदारों ने राज्य उपभोक्ता फोरम में इसकी शिकायत की, जो खारिज हो गई।

अब आयोग ने खरीदारों के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने कहा है ,‘यह आम बात है कि बिल्डर-खरीदार के बीच करार में शर्तें ऐसी होती हैं, जो बिल्डरों को लाभ पहुंचाने वाली होती हैं। हमारी नजर में यह करार अत्यंत अनुचित है। प्राकृतिक न्याय यही है कि बिल्डर की तरह खरीदार भी दूसरे पक्ष की खामी होने पर ब्याज वसूलने का हकदार हो।’ यह फैसला दूसरों के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा। अपना एक आशियाना हो, यह ललक हर किसी की रहती है। बहुत सारे लोग हर तरह की परेशानी उठाते हुए मकान खरीदने के लिए पैसे जुटाते हैं। बिल्डर उनसे जल्द फ्लैट देने के नाम पर पैसा जमा करा लेते हैं और सालोंसाल उन्हें लटकाए रहते हैं। इस तरह का गोरखधंधा आम है। तमाम चीख-पुकार के बाद केंद्र सरकार ने रियल एस्टेट एक्ट (रेरा) बना कर पहली मई, 2017 से लागू तो कर दिया है, लेकिन इसका कोई लाभ अभी उपभोक्ताओं को नहीं मिल पा रहा है। रेरा के मुताबिक राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को नियामक प्राधिकरण बना कर कानूनों को लागू कराना है।

कई राज्य इस बारे में शिथिल हैं और कई ने तो अपने हिसाब से जो अधिनियम बनाए हैं, उनमें बिल्डरों को कई तरह की रियायतें दे दी हैं। बिल्डर पैसे और रसूख वाले होते हैं और वे राजनीतिक दलों के बड़े चंदादाता भी होते हैं। इसलिए सरकारें कानून कुछ भी बनाएं, उनके दिखाने के दांत और तथा खाने के दांत और होते हैं। देश में रीयल एस्टेट का कारोबार अरबों-खरबों का है और छिहत्तर हजार कंपनियां इसमें अपना धंधा कर रही हैं। हर साल दस लाख लोग आवास खरीदते हैं। सरकार खुद भी सबको मकान देने का वादा कर चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि सरकारी प्राधिकरण से लेकर निजी बिल्डर-रियल्टर जिस तरह की ठगी खरीदारों के साथ करते हैं, क्या इसी तरह से लोगों को घर दिलाया जाएगा!

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