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Author October 22, 2014 09:54 am
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जनसत्ता 22 अक्तूबर, 2014: करीब महीने भर पहले सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न कंपनियों को 1993 से आबंटित किए दो सौ अठारह कोयला खदानों में से दो सौ चौदह के आबंटन रद्द कर दिए थे। तब कुछ लोगों ने अदालत के फैसले को उद्योग जगत के लिए झटका माना था। उन्हें अंदेशा था कि इससे कोयले की आपूर्ति, इस्पात और बिजली उत्पादन आदि के लिए संकट खड़ा हो सकता है। इस तरह की बातें तब भी कही गई थीं जब अदालत ने दूरसंचार घोटाले से जुड़े एक सौ बाईस लाइसेंस खारिज कर दिए थे। लेकिन अदालत के फैसले का आखिरकार सकारात्मक नतीजा ही निकला है। सरकार को उसके फैसले से सबक लेते हुए कोयला खदानों के आबंटन के लिए नीलामी की प्रक्रिया अपनानी पड़ी है। फिर, इसमें पारदर्शिता सुनिश्चित करने के भी कई उपाय किए गए हैं। सरकार के ताजा कदम ने रद्द किए गए आबंटनों को लेकर चली आ रही अनिश्चितता की स्थिति समाप्त कर दी है। उसके ताजा निर्णय का असर यह होगा कि कोयले से संचालित बिजलीघरों के लिए र्इंधन की निर्बाध आपूर्ति का रास्ता साफ होगा। इस्पात और कई दूसरे उद्योग, जो कोयले की निकासी में आई भारी कमी के चलते सांसत में थे, राहत महसूस करेंगे। विनिर्माण क्षेत्र को भी गति मिलेगी। एक और बड़ा लाभ यह होगा कि कोयले के आयात से निजात मिलेगी, या कम से कम उस पर निर्भरता काफी हद तक घट जाएगी।

 

यह कोयला घोटाले की ही देन है कि देश के पास प्रचुर कोयला भंडार होने पर भी वह बरसों से अरबों रुपए का कोयला आयात करता रहा है; दुनिया में सबसे ज्यादा कोयला-संपन्न देशों में पांचवें स्थान पर होने के बावजूद भारत इसकाआयात करने वाले देशों की सूची में तीसरे स्थान पर आ गया। केंद्र सरकार के इस निर्णय का स्वागत करते हुए उद्योग जगत ने इसे आर्थिक सुधारों की दिशा में बड़ा कदम बताया है। उनकी प्रतिक्रिया वाजिब है। पर 1993 से 2010 के बीच जब धड़ाधड़ आबंटन किए गए तो उसे भी आर्थिक सुधारों के ही पक्ष में माना गया था। नियम-कायदों की अनदेखी और पक्षपात पर खामोशी छाई रही। यह तो नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक की रिपोर्ट थी, जिसके चलते अनियमितताएं उजागर हुर्इं और आबंटन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए। गौरतलब है कि कोयला क्षेत्र की अनियमितताओं के सत्रह बरसों के दरम्यान कांग्रेस भी केंद्र की सत्ता में रही और भाजपा भी। इसलिए इस दौर में जो कुछ हुआ, उससे दोनों पार्टियां पल्ला नहीं झाड़ सकतीं। बहरहाल, केंद्र सरकार ने कहा है कि नीलामी की प्रक्रिया तीन-चार महीने में पूरी कर ली जाएगी। पहले चरण में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को आबंटन होगा। फिर इस्पात और बिजली उत्पादन से जुड़ी निजी कंपनियों के लिए, न्यूनतम आरक्षित मूल्य तय कर, इ-नीलामी शुरू की जाएगी।

 

इसी के साथ सरकार ने कोयला क्षेत्र उन कंपनियों के लिए भी खोलने का इरादा जताया है जो कोयले का अंतिम उपयोग खुद नहीं करेंगी। पर सरकार ने यह सफाई भी दी है कि इसका मतलब कोयला क्षेत्र के राष्ट्रीयकरण को पूरी तरह समाप्त करना न समझा जाए। यह स्पष्टीकरण विवाद से बचने की एक तरकीब से ज्यादा कुछ नहीं है। असल सवाल राष्ट्रीय संपदा के इस्तेमाल में पारदर्शिता का है। केंद्र के फैसले का एक सराहनीय पहलू यह भी है कि नीलामी से प्राप्त राजस्व संबंधित राज्यों को मिलेगा। इससे बंगाल, ओड़िशा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे कोयला-समृद्ध राज्यों को अपनी माली हालत सुधारने का मौका मिलेगा। पर उन स्थानीय बाशिंदों को क्या हासिल होगा, जिन्हें खनन परियोजनाओं के लिए उजड़ना पड़ता है। क्या खनन के आर्थिक लाभ में उनकी भी कुछ हिस्सेदारी तय होगी?

 

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