ताज़ा खबर
 

सियासी खेल

धर्मशाला में मैच आयोजन को सियासी हार-जीत का सवाल बनाया जाना इसलिए भी अनुचित है कि भारत-पाक क्रिकेट मुकाबले में दुनिया भर के खेल प्रेमियों की रुचि रहती है और इसका टलना या ऐन वक्त पर आयोजन स्थल बदलना मुल्क की किरकिरी ही कराएगा।
Author नई दिल्ली | March 3, 2016 01:49 am
एशिया कप में ढाका में हुए टी20 मुकाबले में हार्दिक पंड्या की गेंद पर आउट होकर पवेलियन लौटते पाकिस्तानी बल्लेबाज शोएब मलिक। (पीटीआई फाइल फोटो)

धर्मशाला में भारत-पाक मैच के आयोजन पर मंडराता अनिश्चय का साया क्रिकेट में राजनीति के दखल की दुखद मिसाल है। हमारे यहां खेलों में राजनीति की घुसपैठ पर लगातार चिंता जताई जाती रही है मगर अफसोसनाक है कि यह कम होने के बजाय बढ़ती गई है। इस घुसपैठ का ताजा शिकार उन्नीस मार्च को धर्मशाला में भारत-पाक के बीच होने वाला टी-20 विश्वकप का मैच है जो खटाई में पड़ता लग रहा है। गौरतलब है कि हिमाचल में वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार है, जबकि मैच का आयोजक भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) है जिसके सचिव भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर हैं और वे वीरभद्र सिंह के कट्टर विरोधी पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के पुत्र हैं। हिमाचल की राजनीति में धुर विरोधी इन दोनों ध्रुवों की अदावत किसी से छुपी नहीं है। वीरभद्र सिंह ने सुरक्षा कारणों और पूर्व सैनिकों के विरोध का हवाला देकर धर्मशाला में मैच का आयोजन कराने में असमर्थता जताई है। उनके मुताबिक कांगड़ा जिले में कई सैनिकों के घर हैं जिनमें कारगिल युद्ध के हीरो विक्रम बतरा और कैप्टन सौरभ कालिया शामिल हैं, लिहाजा पाकिस्तान के मैचों की मेजबानी वहां करने से शहीदों के परिवारों की भावनाएं आहत होंगी। उधर आयोजक खेमे का आरोप है कि मुख्यमंत्री नहीं चाहते कि उनके राज्य में मैच के सफल आयोजन का श्रेय राजनीतिक विरोधियों को मिले। उसके अनुसार विश्वकप मैचों के आयोजन स्थल एक साल पहले ही तय हो गए थे। किस टीम का मुकाबला कहां और किससे होगा यह भी छह महीने पहले निर्धारित कर दिया गया था तो ऐन मौके पर हाथ खड़े कर देने का क्या औचित्य है? बहरहाल, दोनों पक्ष अपने तर्क में वजन बेशक देख रहे हों लेकिन टी-20 विश्वकप के अत्यंत करीब आ जाने से क्या उन्हें आरोपों के खेल में उलझने के बजाय राजनीति से ऊपर उठ कर फैसले लेने की उदारता नहीं दिखानी चाहिए?

यह अक्सर सुभाषित की तरह दोहराया जाता है कि क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल है। हालांकि इस सुभाषित की सच्चाई को संदिग्ध बनाने वाले मैच फिक्सिंग, मैदान में गाली-गलौच, अभद्र बर्ताव आदि के मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन अच्छी बात है कि इन बुराइयों के खिलाफ सबसे मुखर आवाजें भी क्रिकेट के भीतर से ही आई हैं। अलबत्ता उन्हें लगातार अनसुना किया गया है। नौबत यहां तक है कि राज्योें के क्रिकेट संघ हों या भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, लगभग सभी पर राजनीतिक या उनके परिजन काबिज हैं। जब क्रिकेट की नियामक संस्थाओं पर ही राजनीतिक दलों से जुड़े लोग हावी रहेंगे तो इस खेल के राजनीति से अछूता रहने की उम्मीद कैसे की जा सकती है! धर्मशाला में मैच आयोजन को सियासी हार-जीत का सवाल बनाया जाना इसलिए भी अनुचित है कि भारत-पाक क्रिकेट मुकाबले में दुनिया भर के खेल प्रेमियों की रुचि रहती है और इसका टलना या ऐन वक्त पर आयोजन स्थल बदलना मुल्क की किरकिरी ही कराएगा। पाकिस्तानी खिलाड़ियों को सुरक्षा मुहैया कराने में भारत जैसे समर्थ देश की असमर्थता की बात भी शायद ही किसी के गले उतरे क्योंकि वह तमाम बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न कराता रहा है। बेहतर होगा, हमारे राजनीतिक दलों के नेता खेल को खेल ही रहने दें, उसे अपने सियासी स्वार्थों का शिकार न बनाएं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग