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हादसे की पटरी

ट्रेनों की गति और संख्या के हिसाब से पटरियों की गुणवत्ता और सही समय पर उन्हें बदलने की जरूरत की अनदेखी के चलते ही कई बार चलती ट्रेनें पलट जाती हैं।
Author नई दिल्ली | May 3, 2016 03:34 am
हापुड़ के पास दिल्ली-फैजाबाद एक्सप्रेस के आठ डिब्बे पटरी से उतर गए। (पीटीआई फोटो)

हापुड़ में हुए रेल हादसे से फिर यह सवाल उठा है कि ट्रेनों से सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित किए बिना किस आधार पर भारतीय रेल को विश्व मानकों के अनुरूप बनाने के दावे किए जा रहे हैं। गढ़मुक्तेश्वर और कंकाठेर स्टेशन के बीच अल्लाबक्शपुर गांव के पास जिस तरह दिल्ली-फैजाबाद एक्सप्रेस के आठ डिब्बे पटरी से उतर कर दुर्घटनाग्रस्त हो गए, क्या वह संयोग से घटा एक हादसा है? गनीमत बस यही रही कि इतने गंभीर हादसे में भी सौ से ज्यादा लोग घायल हुए, मगर किसी की जान नहीं गई। दरअसल, अगले हिस्से से छूटे डिब्बे तेज गति से चलते हुए जिस ओर पलटे, उसके उलटी ओर पलटते और करीब बीस फुट गहरी खाई में गिरते तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि हादसे की भयावहता क्या होती।

शुरुआती जांच में इस दुर्घटना का कारण पटरियों का चटकना बताया गया है। यों भी जिन रास्तों पर गाड़ियों की संख्या ज्यादा है, वहां क्षमता से अधिक बोझ और लगातार दबाव पड़ने की वजह से पटरियों के अपनी जगह से हिल जाने, चटकने या खिसक जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। ट्रेनों की गति और संख्या के हिसाब से पटरियों की गुणवत्ता और सही समय पर उन्हें बदलने की जरूरत की अनदेखी के चलते ही कई बार चलती ट्रेनें पलट जाती हैं। हैरानी की बात यह है कि वजहों की पहचान के बावजूद इससे निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है, रेल महकमे की ओर से भविष्य में ऐसे हादसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की घोषणा की जाती है। लेकिन अमल की हकीकत यह है कि कुछ ही समय बाद हादसे की मुख्य वजह फिर वही दर्ज की जाती है। सवाल है कि ट्रेनों के संचालन से जुड़े बुनियादी पहलुओं पर ध्यान देना और उसे पूरी तरह सुरक्षित बनाना किसकी जिम्मेदारी है? इसके अलावा, हादसे की हालत में रेलवे के बचाव के उपाय और तंत्र की सक्रियता की दशा भी दयनीय है। कई बार तो हादसे के बाद जब तक बचाव दल पहुंच पाता है तब तक स्थानीय लोग बचाव और राहत का काम बहुत आगे बढ़ा चुके होते हैं।

ताजा हादसे में भी अल्लाबक्शपुर गांव के लोगों ने तुरंत घटनास्थल पर पहुंच कर काफी लोगों को डिब्बों की खिड़कियां तोड़ कर बाहर निकाला और हरसंभव मदद की। पटरियों की गुणवत्ता के सवाल या रेलवे क्रॉसिंग पर कर्मचारी की अनिवार्य उपस्थिति से लेकर दूसरी तमाम वजहों से जब-तब रेल हादसे हो रहे हैं और दूसरी ओर सरकार ट्रेन-यात्रा को महंगा करने और तेज गति वाली अत्याधुनिक ट्रेनें चलाने के प्रचार में लगी है। ट्रेनों की लेटलतीफी की समस्या से निपटना ऐसा लगता है कि और ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है। मोदी सरकार के आने के बाद से बुलेट ट्रेन से लेकर शानो-शौकत वाली ट्रेनों के परिचालन की दिशा में बढ़-चढ़ कर दावे किए जा रहे हैं, लेकिन सुरक्षित परिचालन की अनिवार्य और सबसे पहली शर्त को सुनिश्चित करना जरूरी नहीं समझा जा रहा। सच यह है कि इन दावों के बीच ट्रेन दुर्घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है।

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