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दिल्ली विधानसभा चुनाव: सुधार की कवायद

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक ऐसे समय में आयोजित हुई, जब दिल्ली विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है और केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर विरोध का माहौल बन रहा है। लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की यह दूसरी बैठक है, जिसमें पार्टी को मजबूत बनाने के उपायों पर मंथन किया गया। […]
Author January 15, 2015 14:49 pm
जम्मू: मोदी और राहुल (एक्सप्रेस फोटो)

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक ऐसे समय में आयोजित हुई, जब दिल्ली विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है और केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर विरोध का माहौल बन रहा है। लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की यह दूसरी बैठक है, जिसमें पार्टी को मजबूत बनाने के उपायों पर मंथन किया गया। राहुल गांधी ने अपने पुराने अंदाज में नीचे से लेकर ऊपर तक पार्टी में ढांचागत बदलाव के प्रस्ताव पेश किए। उन पर कार्यसमिति में सहमति भी बनी।

अब पार्टी संविधान में चुने हुए पदाधिकारियों का कार्यकाल फिर से घटा कर पांच से तीन साल कर दिया गया है। हालांकि पहले उनका कार्यकाल तीन साल होता था, जिसे बुराड़ी सम्मेलन में बढ़ा कर पांच साल कर दिया गया था। इस नए बदलाव से किसी पदाधिकारी पर अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने का एक मनोवैज्ञानिक दबाव जरूर बन सकता है, मगर जिस स्थिति में अभी कांग्रेस पहुंच चुकी है, उससे कार्यकर्ताओं को बाहर निकालने के लिए पार्टी के पदाधिकारी कितना जोर लगाते हैं, देखने की बात होगी। पहले भी राहुल गांधी ने पार्टी के ढांचे को लोकतांत्रिक और मजबूत बनाने के मकसद से निचले स्तर के कार्यकताओं-नेताओं को अधिकार संपन्न बनाने पर जोर दिया था, कुछ नियमों में बदलाव भी किए थे। अभी लोकसभा में बुरी गत के बाद हाल के विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों से भी पार्टी का मनोबल खासा आहत हुआ है।

स्वाभाविक रूप से पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने राज्य और जिला स्तर की इकाइयों को मजबूत बनाने के मकसद से उनमें पदाधिकारियों की संख्या में अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला वर्ग के सदस्यों की हिस्सेदारी पचास फीसद तक बढ़ाने पर जोर दिया। इसे पार्टी के संविधान में भी शामिल कर लिया गया है। अभी नरेंद्र मोदी सरकार के फैसलों और नीतियों के चलते उसके विरोध में स्वर उभरने शुरू हो गए हैं, उस पर अपने कार्यकर्ताओं को लामबंद करने का उचित समय चुना है।

अच्छी बात है कि इस बैठक में राहुल गांधी को वैसी अहमियत नहीं दी गई, जैसी पहले दी जाती थी। उनका जादू नहीं चल पाया, बल्कि उनको आगे करके कांग्रेस ने अपनी कमजोरी ही जाहिर की। इसलिए पार्टी में लोकतांत्रिक व्यवस्था आजमाने का नुस्खा शायद कुछ काम आ जाए। मगर यह सब इस पर निर्भर करेगा कि उसके कार्यकर्ता कितने सक्रिय हो पाते हैं। कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेताओं का जमीनी जुड़ाव न के बराबर है। वे सैद्धांतिक रूप से चाहे जितनी बड़ी बातें कर लें, व्यावहारिक धरातल पर उतरने से बचते रहे हैं।

एक प्रकार से अपनी ही पार्टी के स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं से उनकी दूरी बनी रहती है। जब तक वे जमीनी हकीकत को करीब से जान-समझ और अपने निचले स्तर के नेताओं-कार्यकर्ताओं से नजदीकी बना कर किसी आंदोलन को आगे नहीं बढ़ाएंगे, पार्टी को नई ताकत दे पाना कठिन बना रहेगा। अभी कांग्रेस ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर देशव्यापी अभियान छेड़ने का संकल्प लिया है। जाहिर है, इस मुद्दे को उसने विपक्षी दलों का रुख भांपते हुए और खुद भाजपा के आनुषंगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच के भी इस पर विरोध को देखते हुए चुना है। लोकसभा में विपक्ष नदारद है, वहां सरकार अपने ढंग से फैसले करने को एक तरह से स्वतंत्र है।

ऐसे में सदन के बाहर ही सरकार के फैसलों पर जनमत बनाने की कोशिशें कुछ दबाव बना सकती हैं। मगर कांग्रेस कितने जोश के साथ इस दिशा में आगे बढ़ती है, यह काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा। मगर कार्यसमिति की ताजा बैठक में जिस तरह कोई ऊष्मा नहीं देखी गई, उससे कोई दावा करना कठिन है।

 

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  1. J
    Jalpa Shah
    Jan 16, 2015 at 2:33 pm
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    Reply
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