June 23, 2017

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संपादकीयः बरपा जो हंगामा

दिल्ली सरकार ने एक ऐसा अभियान चलाने का फैसला किया है, जिसकी वैसे तो तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन साथ में यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि इस नेक काम में इतनी देर कैसे हो गई?

Author October 28, 2016 02:46 am
डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया

दिल्ली सरकार ने एक ऐसा अभियान चलाने का फैसला किया है, जिसकी वैसे तो तारीफ की जानी चाहिए, लेकिन साथ में यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि इस नेक काम में इतनी देर कैसे हो गई? यह फैसला है खुलेआम शराब पीने और पीकर हंगामा करने वालों पर भारी जुर्माना लगाने तथा जेल भिजवाने का। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने घोषणा की है कि सात नवंबर से अगर दिल्ली में कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थल या कहीं भी खुले में शराब पीता पकड़ा जाएगा तो उसे पांच हजार रुपए का जुर्माना और पीकर हंगामा करने वाले को दस हजार रुपए का जुर्माना देना पड़ेगा। जुर्माना न देने पर उसे जेल की हवा खानी पड़ेगी। इस बीच दिल्ली सरकार जागरूकता अभियान चलाएगी और आबकारी विभाग संदिग्ध स्थलों की निशानदेही करेगा। देर से ही सही, दिल्ली सरकार ने दुरुस्त कदम उठाया है। ऐसा अभियान दिल्ली ही नहीं, देश के दूसरे हिस्सों में भी चलना चाहिए। लंबे समय से देखा जा रहा है कि दिल्ली या एनसीआर में अपराधों की जो झड़ी लगी हुई है, उसमें शराब भी एक बड़े कारक के रूप में मौजूद रही है। निर्भया कांड से लेकर तमाम बड़े अपराधों में यह देखा गया कि अपराधी शराब पिये हुए थे। बहुत मुमकिन है कि शराब पीकर घूमने वालों या वाहन चलाने वालों पर निगरानी रखी गई होती तो कई संगीन आपराधिक घटनाओं को रोका जा सकता था। दिल्ली में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में भी ज्यादातर मामले शराब पीकर गाड़ी चलाने से ही संबधित होते हैं। अदालतें शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों पर शिकंजा कसने का निर्देश देती रही हैं। लेकिन मामला वही ढाक के तीन पात होकर रह जाता है।


दिल्ली सरकार हो या कोई और सरकार, असल तकाजा राजनीतिक इच्छाशक्ति का रहता है। जैसे ही कोई रसूखदार व्यक्ति या उसके परिवार का सदस्य या बेटा-बेटी इस तरह के जुर्म में पकड़े जाते हैं, फोन की घंटियां टनटनानी शुरू हो जाती हैं और जो लोग अभियानों को लागू करने निकलते हैं, खुद वही छोड़ने-छोड़वाने की पैरवी करते नजर आते हैं। दिल्ली के कनॉट प्लेस से लेकर तमाम ऐसी जगहें हैं, जहां शराब के ठेकों के बगल में खुलेआम पुलिस के संरक्षण में मयकशी होती है। इन दिनों तो पार्किंग स्थल शराबखोरी के सबसे बड़े अड्डे बने हुए हैं। इसके अलावा रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, ढाबे, पान की दुकानें वगैरह भी इस कृत्य के लिए मुफीद जगहें हैं। इतने बड़े स्तर पर शराबखोरी रोकने के लिए तो शायद दिल्ली सरकार को भी भारी-भरकम अमला चाहिए होगा। फिर भी, उम्मीद की जानी चाहिए कि इस अभियान से कम से कम मोहल्लों व नागरिकों की आम आवाजाही के बीच जो खुल्लमखुल्ला शराब पी जाती है, और समाज की शांति भंग होती है, उस पर शायद कुछ लगाम लग सके। पियक्कड़ों पर काबू पाने की एक व्यावहारिक दिक्कत यह भी है कि ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो आमतौर पर ड्यूटी से छूटने के बाद अपने दफ्तर के आसपास या रास्ते में या अपने वाहनों में शराब पीते हैं। ऐसे लोगों पर भी निगरानी जरूरी है। मेट्रो टेÑन आदि में भी ऐसे लोगों के बैठने पर रोक लगाई जानी चाहिए। यह भी देखना होगा कि कहीं यह अभियान अपने मूल मकसद से भटक कर आबकारी विभाग और पुलिसकर्मियों के लिए अवैध कमाई का जरिया न बन जाए।

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First Published on October 28, 2016 2:45 am

  1. A
    Avinash
    Oct 28, 2016 at 4:43 pm
    बधाई...AAP से हमे उम्मीद है...बस केजरीवाल साब थोड़ा काम बोलेन और काम अधिक करें. नहीं तो केजरीवाल और मोदी में क्या फर्क रहेगा.
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    सबरंग