March 23, 2017

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बुजुर्गों की सुध

केंद्र सरकार अगले शनिवार यानी पच्चीस मार्च से बुजुर्गों के लिए राष्ट्रीय वयोश्री योजना शुरू करने जा रही है।

Author March 21, 2017 05:26 am
कोई चलने में असमर्थ है तो कोई सुनने में। किसी की दृष्टि कमजोर हो गई है तो कोई विकलांग है।

यह स्वागतयोग्य है कि केंद्र सरकार अगले शनिवार यानी पच्चीस मार्च से बुजुर्गों के लिए राष्ट्रीय वयोश्री योजना शुरू करने जा रही है। पहले इसे जनवरी में शुरू किया जाना था, लेकिन पांच राज्यों में चुनाव आ जाने के कारण इसे मुल्तवी करना पड़ा। पिछली जनगणना के मुताबिक देश में करीब साढ़े दस करोड़ वृद्ध हैं। इनमें 5.2 फीसद बुजुर्गों की स्थिति शारीरिक रूप से काफी दयनीय है, क्योंकि वे कई तरह की अवस्थाजन्य कमजोरियों के शिकार हैं। कोई चलने में असमर्थ है तो कोई सुनने में। किसी की दृष्टि कमजोर हो गई है तो कोई विकलांग है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने योजना का विस्तृत मसविदा तैयार किया था, जिस पर मंत्रिमंडल की मुहर लग चुकी है। मंत्रालय ने पिछले दिसंबर में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर लाभार्थियों की पहचान करने और उनकी सूची तैयार करने के लिए कहा था। मंत्रालय की ओर से कहा गया कि फिलहाल यह योजना गरीबी रेखा से नीचे के बुजुर्गों के लिए लागू की जाएगी।

मोटे तौर पर इस योजना का मकसद वृद्धों को जरूरी उपकरण मुहैया कराना है। इसमें आरामदायक जूते, बैसाखी, कृत्रिम दांत, व्हीलचेयर, श्रवणयंत्र, चश्मा आदि सहायक यंत्र जरूरतमंदों को मुफ्त दिए जाएंगे। निस्संदेह यह योजना कई कारणों से बहुत जरूरी थी। जिस तरह देश में बुजुर्गों की दुर्दशा बढ़ रही है और वे परिवारों में भी उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं, उसमें सरकार का आगे बढ़ कर मदद करना जरूरी हो जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में तो वृद्धों की बदहाली है ही, कई बार तो संपन्न घरों में भी वे अपने ही बाल-बच्चों की तरफ से उपेक्षा और तिरस्कार के शिकार होते हैं। देश में ऐसे वृद्ध लोगों की संख्या बहुत बड़ी है, जिनके पास पेंशन या किसी अन्य किस्म की कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है, खासकर किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों की लाचारी किसी से छिपी नहीं है। परिवारों में गरीबी की मार सबसे ज्यादा बूढ़ों पर ही पड़ती है। उनका इलाज कराना हो या उनके लिए कुछ खरीद-फरोख्त करना हो तो मान लिया जाता है कि उनकी प्राथमिकताएं और जरूरतें बेमानी हैं।

उनके साथ ऐसे व्यवहार किया जाता है, जैसे वे परिवार के लिए बोझ हों। ऐसी स्थिति में अगर सरकार ने उनके लिए थोड़ी-बहुत इमदाद पहुंचाने की सोची है, तो यह सराहनीय है। लेकिन जैसा कि सामाजिक कल्याण एवं अधिकारिता मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बताया है कि हर राज्य के दो जिलों में ही शिविर लगाए जाएंगे और हर शिविर में सिर्फ दो हजार लोगों को उपकरण बांटे जाएंगे। इसका मतलब है कि हर राज्य में सिर्फ चार हजार लोगों को लाभार्थी माना जाएगा। अगर इस योजना की कुल गहमागहमी का इतना भर ही नतीजा है तो यह एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम भर होकर रह जा सकती है। सरकार ने अगर नेक काम में कदम बढ़ाया है तो फिर कृपणता क्यों! विडंबना यह है कि श्रेय लेने की उतावली और विज्ञापनबाजी में सरकार को पैसा फूंकना हो, तो उसके लिए पैसे की कोई तंगी नहीं होती, मगर कल्याणकारी कार्यक्रमों की बाबत अक्सर पैसे का टोटा हो जाता है!

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First Published on March 21, 2017 5:25 am

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