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उपचुनावों के संकेत

तब यह मांग भी की गई कि या तो मतदान बैलेट पेपर से हों या फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक ईवीएम के साथ वीवीपीएटी के उपयोग को अनिवार्य बनाया जाए।
Author August 30, 2017 05:14 am
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी (photo source – Indian express)

हालांकि तीन राज्यों में सिर्फ चार विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के परिणामों को आमराय के तौर पर नहीं देखा जा सकता, लेकिन कई बार राजनीतिक हालात ऐसे होते हैं कि नतीजों की व्याख्या में आम लोगों के रुख के आकलन की कोशिश की जाती है। इन उपचुनावों में जहां भाजपा ने गोवा की दोनों विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की, वहीं ‘आप’ यानी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की बवाना सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। आंध्र प्रदेश की नांदयाल सीट तेलुगु देशम पार्टी को मिली। दलों के लिहाज से देखें तो कांग्रेस हर जगह घाटे में रही। अलबत्ता दिल्ली में उसका मत-प्रतिशत बढ़ना इस बात का संकेत है कि यहां अब कोई भी चुनाव तिकोने मुकाबले का ही होगा। गोवा की जिस पणजी सीट से मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर जीते, वह भाजपा के ही विधायक सिद्धार्थ कुनकालीनेकर के इस्तीफे से खाली हुई थी।

गोवा का मुख्यमंत्री बनने के बाद पर्रीकर के लिए विधानसभा का सदस्य बनना जरूरी था। वहां दूसरी सीट वालपेई पर भाजपा प्रत्याशी के रूप में विश्वजीत राणे ने जीत दर्ज की, जिन्होंने इसी साल फरवरी में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीता था। इधर बवाना में पिछले विधानसभा चुनाव में ‘आप’ के टिकट पर जीते वेद प्रकाश इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे, लेकिन उपचुनाव में नहीं जीत सके। इस सीट पर ‘आप’ उम्मीदवार रामचंद्र ने बड़े अंतर से भाजपा उम्मीदवार के रूप में वेद प्रकाश को हराया। नांदयाल विधानसभा सीट पर हालांकि पहले से ही टीडीपी का कब्जा था, लेकिन भुमा नागिरेड्डी के निधन के बाद हुए उपचुनाव में पार्टी के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन गई थी, जिसमें अपने उम्मीदवार भुमा ब्रह्मानंद रेड्डी की जीत के साथ वह कामयाब रही। इन चारों सीटों में बवाना पर ‘आप’ की जीत को स्वाभाविक ही सबसे ज्यादा सुर्खी मिली।

दरअसल, पिछले दिनों ‘आप’ के कुछ विधायकों के खिलाफ जिस तरह भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए थे, उसमें चुनाव पर उसके असर की आशंका थी। लेकिन शायद इसका ज्यादा नुकसान ‘आप’ को नहीं हुआ। दूसरी ओर, नगर निगम के चुनाव जीतने के बाद यहां खुद को आश्वस्त मान कर चल रही भाजपा को अहसास हो गया कि दिल्ली उसके लिए चुनौती-विहीन नहीं है। इन चुनावों में एक खास बात यह थी कि मतदान के लिए ईवीएम के साथ वीवीपीएटी का भी इस्तेमाल किया गया। गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों के बाद कई पार्टियों ने ईवीएम की गड़बड़ी के आरोप लगाए थे। तब यह मांग भी की गई कि या तो मतदान बैलेट पेपर से हों या फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक ईवीएम के साथ वीवीपीएटी के उपयोग को अनिवार्य बनाया जाए। अच्छा है कि चुनावी प्रक्रिया को ज्यादा विश्वसनीय और साफ-सुथरा बनाने के लिए चुनाव आयोग ने इस बार वीवीपीएटी से लैस ईवीएम का इस्तेमाल किया। जो हो, ताजा नतीजों के संकेत साफ हैं कि अब केवल प्रचार के बूते वोट हासिल करना आसान नहीं है। जमीनी स्तर पर लोगों को सामान्य जीवन से जुड़े जिन मुद््दों से रूबरू होना पड़ता है, आमतौर पर उनके वोट भी उसी के मुताबिक तय होते हैं।

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