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संपादकीयः बिम्सटेक की राह

आतंकवाद के मसले पर अपनी विदेश नीति को नई धार देने में जुटे भारत के लिए ब्रिक्स के बाद बिम्सटेक की शिखर बैठक एक बड़ी कूटनीतिक राहत साबित हुई।
Author October 19, 2016 03:08 am

आतंकवाद के मसले पर अपनी विदेश नीति को नई धार देने में जुटे भारत के लिए ब्रिक्स के बाद बिम्सटेक की शिखर बैठक एक बड़ी कूटनीतिक राहत साबित हुई। यों ब्रिक्स ने भी अपने घोषणापत्र में आतंकवाद की खुलकर निंदा करने के साथ ही सारे देशों का आह्वान किया कि वे अपनी जमीन पर कोई आतंकवादी गतिविधि न होने दें। लेकिन सिर्फ इतना भारत की मंशा के अनुरूप नहीं था। ब्रिक्स के घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का भी जिक्र हुआ और आइएस व अलकायदा का भी, पर लश्कर-ए-तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का जिक्र नहीं आ सका, जो कि भारत के लिए निराश करने वाली बात थी। ऐसा क्यों हुआ होगा, यह अब कोई रहस्य की बात नहीं है, क्योंकि ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लौटते ही वहां के विदेश मंत्रालय ने साफ कह दिया कि चीन आतंकवाद को किसी भी देश से जोड़ कर देखने के पक्ष में कतई नहीं है। इसी बयान में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान ने आतंकवाद से लड़ने में कुर्बानियां दी हैं और वह चीन का सदाबहार दोस्त है। साफ है कि आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स के प्रभावकारी रुख न अपना सकने के पीछे चीन का अड़ंगा रहा होगा। लेकिन बिम्सटेक ने इस मामले में कड़ा संदेश दिया है। बिम्सटेक की बैठक रविवार को गोवा में हुई और घोषणापत्र सोमवार को जारी किया गया। घोषणापत्र में कहा गया है, समूह यानी बिम्सटेक ‘इस क्षेत्र में शांति और स्थायित्व के लिए आतंकवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में देखता है।’ इसमें यह भी कहा गया है कि आतंकियों का शहीदों के रूप में महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिए। इशारा नवाज शरीफ के उस बयान की तरफ होगा जिसमें उन्होंने हिज्बुल के कश्मीर कमांडर बुरहान वानी को ‘शहीद’ करार दिया था। घोषणापत्र में सीधे तौर पर उड़ी हमले का जिक्र नहीं है, पर यह जरूर कहा गया है कि बिम्सटेक इस क्षेत्र में हालिया बर्बर हमलों की कड़े शब्दों में निंदा करता है।
ऐसे समय, भारत जब पाकिस्तान को घेरने या अलग-थलग करने में जुटा हो, एक अंतरराष्ट्रीय मंच का इससे अधिक अनुकूल बयान उसके लिए और क्या हो सकता है! सार्क की बैठक के बहिष्कार के बाद भारत के लिए बिम्सटेक के रुख की अहमियत और बढ़ जाती है। बिम्सटेक में भारत के अलावा बांग्लादेश, म्यांमा, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान और नेपाल शामिल हैं। यानी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मालदीव को छोड़ कर सार्क के सभी सदस्य बिम्सटेक के भी सदस्य हैं। लेकिन समस्या यह है कि चीन ने म्यांमा, श्रीलंका, नेपाल जैसे बिम्सटेक के कई सदस्य देशों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है और पिछले दिनों बांग्लादेश को भारी कर्ज देकर उसे भी अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की है। लिहाजा, बिम्सटेक का गोवा घोषणापत्र भारत के लिए चाहे जितना उत्साहजनक हो, कहना मुश्किल है कि व्यवहार में इसका कितना असर हो पाएगा। बिम्सटेक लंबे समय से ठहराव का शिकार रहा है, जो इससे भी जाहिर है कि 1997 में वजूद में आने के बाद से इसके सिर्फ तीन सम्मेलन हुए। गोवा शिखर सम्मेलन मेें वायु, रेल, सड़क और जल परिवहन के जरिए बेहतर संपर्क सुविधाएं विकसित करने और अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास पर भी सहमति बनी। मोटर वाहन समझौते को मूर्त रूप देने पर विचार किया गया। इस दौरान द्विपक्षीय बैठकें भी हुर्इं। यह अच्छी बात है कि बिम्सटेक की सुस्ती टूट रही है, और इसमें भारत की दिलचस्पी का बड़ा हाथ है।

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