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हड़ताल का संकेत

श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर श्रमिक संगठनों की देशव्यापी हड़ताल का असर बेशक मिलाजुला रहा हो, पर इससे यह संकेत तो गया ही है कि मजदूर हितों की अनदेखी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। इस हड़ताल में दस केंद्रीय श्रमिक संगठनों ने हिस्सा लिया, जिनसे करीब पंद्रह करोड़ कर्मचारी जुड़े हैं। […]
Author नई दिल्ली | September 3, 2015 08:17 am
(एक्सप्रेस फोटो)

श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर श्रमिक संगठनों की देशव्यापी हड़ताल का असर बेशक मिलाजुला रहा हो, पर इससे यह संकेत तो गया ही है कि मजदूर हितों की अनदेखी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है। इस हड़ताल में दस केंद्रीय श्रमिक संगठनों ने हिस्सा लिया, जिनसे करीब पंद्रह करोड़ कर्मचारी जुड़े हैं।

इस हड़ताल को बैंक, बीमा, परिवहन, सार्वजनिक उपक्रम, कोयला, खनन उद्योग, बिजली, तेल-गैस आपूर्ति, बंदरगाह आदि सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों के अलावा असंगठित क्षेत्र का भी सहयोग मिला। जुलाई में प्रधानमंत्री ने श्रमिक संगठनों के नेताओं के साथ बातचीत की थी। तब प्रस्तावित श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर इन संगठनों ने विरोध जताया और अपनी बारह सूत्रीय मांगें रखीं।

सरकार ने उनकी मांगों पर कोई आश्वासन नहीं दिया। दरअसल, नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने पर है, इसके चलते वह श्रम कानूनों में बदलाव कर विदेशी निवेशकों और उद्योग समूहों की चिंताओं का निराकरण करना चाहती है। इस दिशा में कई बदलाव किए भी जा चुके हैं। श्रमिक संगठनों को इस बात पर एतराज है कि सरकार विदेशी कंपनियों की मंशा के अनुरूप श्रम सस्ता बनाने के मकसद से मजदूरों के शोषण का रास्ता खोल रही है। नियमित नौकरियों के बजाय ठेके पर श्रम का रास्ता खुल जाने से मजदूरों के बुनियादी हितों की अनदेखी छिपी बात नहीं है, पर सरकार इसे लेकर कोई व्यावहारिक रास्ता निकालने को तैयार नहीं दिखती। स्वाभाविक ही मजदूर संगठनों में इसे लेकर नाराजगी है।

श्रमिक संगठनों की प्रमुख मांगें हैं कि सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में न सौंपा जाए; ठेका मजदूरों का वेतन, काम के घंटे और सुविधाएं नियमित कर्मचारियों के बराबर हों; न्यूनतम वेतन पंद्रह हजार रुपए हो। सरकार ने पहले ही प्रशिक्षुओं की भर्ती, उन्हें नियमित करने या न करने संबंधी निर्णय, काम के घंटे आदि से जुड़े कई नियम निजी कारखाना प्रबंधनों के विवेक परछोड़ दिए हैं। उन्हें कानून के दायरे में चुनौती नहीं दी जा सकती।

इन्हें देखते हुए श्रम कानूनों में व्यापक बदलाव संबंधी सरकार के इरादे का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। जिस तरह प्रधानमंत्री ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम की घोषणा की और तमाम विदेश यात्राओं के दौरान वे प्रवासी भारतीयों और उद्योगपतियों का आह्वान करते रहे हैं कि वे भारत में आकर कारोबार करें, क्योंकि यहां दूसरे देशों के मुकाबले श्रम काफी सस्ता है, उससे भी श्रम कानूनों में बदलाव को लेकर सरकार की मंशा उजागर है।

विदेशी निवेश आकर्षित करना अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए निस्संदेह जरूरी है, पर इसके लिए श्रम को सस्ता बनाने के उपायों पर अमल करना, उद्योग जगत को स्वतंत्र अधिकार सौंप देना, कई तरह की परेशानियों की वजह बन सकता है। कारोबारी दुनिया में ऊंचे पदों का निर्वाह कर रहे लोगों और निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतनमान में अतार्किक फासले को लेकर लंबे समय से आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं, तिस पर अगर सरकार श्रम कानूनों को व्यावहारिक बनाने के बजाय उस फासले को बढ़ाने का आधार बनाने की कोशिश करे, तो इसे जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

 

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