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संपादकीयः आनाकानी का खेल

लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने में आनाकानी कर रहे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के रवैए को लेकर चल रही सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को पूरी हो गई।
Author October 19, 2016 03:18 am

लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने में आनाकानी कर रहे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के रवैए को लेकर चल रही सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को पूरी हो गई। मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अगुआई वाले तीन सदस्यीय पीठ ने फिलहाल फैसला सुरक्षित कर लिया है और बीसीसीआइ की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर विचार करने के लिए दो हफ्ते का समय भी दे दिया है। इस मामले में अदालत का अंतिम फैसला जो हो, अब तक जो तथ्य सामने आए हैं उसमें बीसीसीआइ, खासकर उसके अध्यक्ष की किरकिरी ही हुई है। गौरतलब है कि लोढ़ा समिति की प्रमुख सिफारिशों में एक यह भी है कि बीसीसीआइ के सभी पदाधिकारियों को हटा दिया जाए और उनकी जगह प्रशासकों का एक पैनल बनाया जाए, जो सर्वोच्च अदालत द्वारा मंजूर सिफारिशों को लागू कर सके। समिति की एक और अहम सिफारिश एक राज्य से एक वोट का प्रावधान शामिल करने की भी है। समझा जाता है कि बीसीसीआइ अध्यक्ष समेत दूसरे पदाधिकारियों को जो बात नागवार गुजर रही है, वह उनका पद से हटाया जाना ही है। इसीलिए जब से सिफारिशें घोषित हुई हैं, तभी से हरसंभव कोशिश इस पर अमल लटकाने की रही है। लोढ़ा समिति का गठन इसलिए हुआ था कि क्रिकेट पर चंद राजनीतिकों, अफसरशाहों और पूंजीपतियों की इजारेदारी खत्म की जा सके। लेकिन देखा यही जा रहा है कि क्रिकेट को अपने घर की खेती बना चुके राजनीतिक, पूंजीशाह और अफसरशाह उसे आजाद करने को राजी नहीं हैं, और तरह-तरह से खुद को जमाए रखने की हिकमतें आजमा रहे हैं।


आरोप है कि बीसीसीआइ अध्यक्ष ने अंतराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आइसीसी) से ऐसा बयान जारी करने के लिए कहा था जिसमें इस बात का उल्लेख हो कि लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू कराना बोर्ड में सरकारी हस्तक्षेप है। अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने शीर्ष अदालत में दिए अपने एक हलफनामे में इस आरोप से इनकार किया है। लेकिन इतना जरूर कहा है कि वे अगस्त में दुबई में आइसीसी के अध्यक्ष शशांक मनोहर से एक बैठक में मिले थे और उन्हें यह याद दिलाया कि बीसीसीआइ अध्यक्ष रहने के दौरान उन्होंने बोर्ड की शीर्ष परिषद में कैग की नियुक्ति को सरकारी हस्तक्षेप मानते हुए आइसीसी द्वारा बीसीसीआइ को निलंबित करने की बात कही थी; अब जबकि वे यानी मनोहर खुद आइसीसी के अध्यक्ष हैं तो इस मामले में पत्र जारी करें। हालांकि मनोहर ने कोई पत्र वगैरह जारी नहीं किया। इस मामले में अदालत के न्यायमित्र के तौर पर गोपाल सुब्रह्मण्यम ने स्पष्ट किया कि आइसीसी द्वारा बीसीसीआइ की सदस्यता रद््द किए जाने की धमकी का जिक्र उठाना अपने आप लोढ़ा समिति की सिफारिशों और उच्चतम न्यायालय के फैसले का पालन न करने का प्रयास ही है। बीसीसीआइ अध्यक्ष का रवैया हर जगह बाधा पहुंचाने वाला प्रतीत होता है। न्यायमित्र ने सवालिया लहजे में कहा कि क्या ऐसे शख्स पर भरोसा किया जाए कि वे सुधारों को लागू करेंगे, जबकि वे खुद आइसीसी के अध्यक्ष से पत्र जारी करने को कह रहे हों? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वह इसमें तह तक जाएगा और यह भी देखेगा कि कहीं यह तौहीन-ए-अदालत का मामला तो नहीं है? इस सख्ती का संकेत साफ है, बीसीसीआइ के पदाधिकारियों को अदालत के निर्देशों का सम्मान करना सीखना ही होगा।

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