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संपादकीयः आरक्षण का आधार

एक बार फिर हरियाणा में जाट समुदाय के लोगों ने आरक्षण के मसले पर आंदोलन की राह पकड़ ली है। कई इलाकों में सड़क और रेल मार्ग बाधित कर दिए गए हैं।
Author February 18, 2016 04:25 am

एक बार फिर हरियाणा में जाट समुदाय के लोगों ने आरक्षण के मसले पर आंदोलन की राह पकड़ ली है। कई इलाकों में सड़क और रेल मार्ग बाधित कर दिए गए हैं। इसके चलते लोगों की आवाजाही और माल ढुलाई आदि में खासी परेशानी हो रही है। स्कूलों को बंद करना पड़ा है। मुख्यमंत्री मंत्रियों की आपात बैठक बुला कर स्थिति पर विचार-विमर्श कर चुके हैं, अब वे जाट नेताओं से बातचीत कर मामले को शांत करने की कोशिश में हैं। मगर जाट नेता अपनी मांग पर अड़े हुए हैं। इससे पहले कांग्रेस सरकार के समय आरक्षण आंदोलन में राज्य को पांच सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा था, इसलिए हरियाणा सरकार इस बार वैसी स्थिति से बचने के रास्ते तलाशने में जुट गई है।

दरअसल, आरक्षण का मसला राजनीतिक दलों के लिए जनाधार बनाने का आसान रास्ता बनता गया है। दो साल पहले यूपीए सरकार के समय जब विभिन्न राज्यों में जाट आरक्षण की मांग जोर पकड़ती दिखने लगी थी तब अधिसूचना जारी करके हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल करने की घोषणा की गई थी। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले को निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक रूप से संगठित जाटों को आरक्षण देना किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रावधान से अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल दूसरी जातियों के अधिकारों का हनन होगा। इस फैसले से जाटों में असंतोष है और वे चाहते हैं कि हरियाणा सरकार जाट आरक्षण से संबंधित विधेयक लाए। मगर संवैधानिक अड़चन के चलते ऐसा करना किसी भी सरकार के लिए आसान काम नहीं है।
उधर राजस्थान में भी जाट समुदाय के लोग आंदोलन पर उतर आए हैं। भरतपुर-धौलपुर में प्रदर्शन हो रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत ने सार्वजनिक रूप से जाटों को आरक्षण दिए जाने में वसुंधरा राजे सरकार की ढुलमुल नीतियों की निंदा की है। उसके बाद कांग्रेस और भाजपा के नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में जुट गए हैं। सभी राजनीतिक दल समझते हैं कि पढ़ाई-लिखाई और नौकरियों में आरक्षण के पीछे संवैधानिक मंशा क्या है, मगर वे अपने राजनीतिक लाभ को ध्यान में रख कर अलग-अलग जातियों को इसके लिए आंदोलन को उकसाते रहे हैं।

हरियाणा में कांग्रेस सरकार ने जाट आरक्षण को हवा दी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड््डा ने चुनाव नजदीक आते देख केंद्र से इसके लिए संविधान संशोधन की सिफारिश भी की थी। इसी तरह राजस्थान में जाटों को आरक्षण देने का वादा वसुंधरा राजे सिंधिया ने इससे पहले मुख्यमंत्री रहते किया था। मगर वे उसे पूरा नहीं कर पार्इं। फिर कांग्रेस की गहलोत सरकार बनी तो उन्हें संतुष्ट करने के लिए अतिरिक्त कोटे की बात शुरू कर दी। अब वे उन्हें उकसा कर भाजपा सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। गुजरात में पटेल आरक्षण की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन हो चुका है। विचित्र है कि ये जातियां सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक रूप से सबल हैं, फिर भी आरक्षण की मांग उठा कर सरकारों पर दबाव बनाने की राजनीति कर रही हैं। इस तरह आरक्षण का मुद्दा जब-तब आंदोलन में तब्दील हो जाता है कि इसकी नए सिरे से समीक्षा की जरूरत नहीं समझी जाती। जाति के बजाय आर्थिक स्थिति को इसका आधार बनाने की सिफारिश पर ध्यान नहीं दिया जाता।

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