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शोक और सबक

पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय में घुस कर आतंकियों ने करीब दो दर्जन लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
Author नई दिल्ली | January 20, 2016 22:06 pm
पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय में प्रवेश करते पाकिस्तानी सेना।

बुधवार को पाकिस्तान कांप गया। बाकी दुनिया भी स्तब्ध रह गई। पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय में घुस कर आतंकियों ने करीब दो दर्जन लोगों को मौत के घाट उतार दिया। लगभग पचास लोग घायल हैं। खबरों के मुताबिक चार आतंकी घने कोहरे का फायदा उठाते हुए विश्वविद्यालय परिसर में घुस गए और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस दिन विश्वविद्यालय में एक साहित्यिक जलसे का भी आयोजन था, जिसमें शिरकत करने के लिए सैकड़ों की तादाद में बाहर से भी लोग आए थे। यह एक मुशायरा था, खान अब्दुल गफ्फार खां की पुण्यतिथि पर आयोजित। कैसी विडंबना है, एक तरफ उन खान अब्दुल गफ्फार खां को स्मरण करने का आयोजन, जिन्हें अहिंसा के प्रति अटूट निष्ठा के कारण ‘सीमांत गांधी’ कहा गया, और दूसरी तरफ, क्रूरता की पराकाष्ठा! आतंकियों की गोली से मरने वालों में विद्यार्थियों, विश्वविद्यालय के सुरक्षा गार्डों और पुलिसकर्मियों के अलावा एक प्राध्यापक भी शामिल हैं जिन्होंने अपनी जान पर खेल कर मुकाबला किया।

इस घटना के पीछे पाकिस्तान के तालिबान यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का हाथ माना जा रहा है। उसके एक ‘कमांडर’ ने खुद एक समाचार एजेंसी को फोन कर इस घटना की जिम्मेवारी ली। मगर बाद में तहरीक-ए-तालिबान इससे पलट गया। पहले जिम्मेदारी लेकर फिर मुकर जाने के पीछे शायद खुद पाकिस्तान में हुई प्रतिक्रियाओं का डर रहा हो। जो हो, हमले की साजिश किन लोगों ने रची और किन लोगों ने उसे अंजाम दिया यह फिलहाल जांच का विषय है। एक साल पहले तालिबान के ही आतंकियों ने पेशावर मेंसैनिक स्कूल पर हमला बोल कर एक सौ चौंतीस बच्चों को मार डाला था। तहरीक-ए-तालिबान के आतंक के और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं। पर ज्यादा गौर करने की बात है कि यह घटना पाकिस्तान के लिए गम के साथ-साथ सबक भी है। आतंकवाद से निपटने के मामले में पाकिस्तान का ढीलमढाल रवैया खुद उसकी शांति, एकता और स्थिरता के लिए खतरा बन गया है।

एक दफा पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा था कि उनका देश आतंकवाद का सबसे ज्यादा शिकार है। तब से पाकिस्तान के राजनीतिकों के बयानों और वहां के मीडिया की चर्चाओं में यह बात बार-बार दोहराई गई है। एक लिहाज से यह गलत भी नहीं है। पिछले कुछ बरसों में सेना और पु्लिस के हजारों जवान अफगानिस्तान से लगे सरहदी इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान से लड़ते हुए मारे गए हैं। दहशतगर्दी के शिकार होकर बहुत-से सामान्य नागिरकों ने भी जान गंवाई है। लेकिन समस्या यह है कि इस तरह की घटनाओं को पाकिस्तान के हुक्मरान महज कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखते हैं।

आतंकवाद के ढांचे को जड़मूल से नेस्तनाबूद करने का संकल्प वे नहीं ले पाते, क्योंकि इसका रणनीतिक इस्तेमाल करने का मोह उनमें बना रहता है, चाहे वह कश्मीर को विवादित बताने की मंशा से हो या अफगानिस्तान में तालिबान के जरिए पैर पसारने की इच्छा से। ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब मुशर्रफ ने स्वीकार किया था कि पाकिस्तान की कमान हाथ में रहने के दौरान उन्होंने आतंकवादी संगठनों को मदद की थी। सियासत में हाशिये पर फेंक दिए गए मुशर्रफ शायद यह कह कर अपने देश में ‘कश्मीर कार्ड’ खेलना चाहते रहे होंगे। पर उन्होंने एक कड़वी हकीकत कबूल की, जो दुनिया को यों तो मालूम रही है। पाकिस्तान को गम से उबरने के साथ-साथ आतंकवाद की बाबत अपने विरोधाभास से भी पार पाने की कोशिश करनी चाहिए।

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