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अरुणाचल में अधीरता

साल 2015 दिसंबर में पैदा हुआ यह संकट अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश से और गहरा गया है।
Author नई दिल्ली | January 27, 2016 01:20 am
कैबिनेट के सहयोगियों के साथ पीएम नरेंद्र मोदी (FILE: PTI)

हमारे लोकतंत्र पर दलीय स्वार्थ किस कदर हावी हो चले हैं, अरुणाचल प्रदेश का राजनीतिक संकट इसकी अफसोसनाक मिसाल है। बीते साल दिसंबर में पैदा हुआ यह संकट प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश से और गहरा गया है। कांग्रेस ने पूर्वोत्तर के अपने इस सियासी किले को बचाने की जद्दोजहद में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तक से गुहार लगाई है। इस मुद्दे पर उसे विपक्षी दलों का साथ भी मिलता नजर आ रहा है। राज्य में यह संकट बीते साल सोलह दिसंबर को प्रदेश कांग्रेस की अंदरूनी कलह से शुरू हुआ, जिसके तहत साठ सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के सैंतालीस विधायकों में से इक्कीस ने बगावत करते हुए मुख्यमंत्री नबाम टुकी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद भाजपा के ग्यारह और दो निर्दलीय विधायकों के साथ बागी कांग्रेस विधाायक केलिखो पूल को नया मुख्यमंत्री ‘चुन’ लिया गया। इस समूचे नाटकीय घटनाक्रम में राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में रही है। उन पर केंद्र की कठपुतली होने के साथ ही विधानसभा का सत्र बुलाने से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 174 और 175 को ताक पर रख कर निर्णय करने के आरोप भी लगे हैं। इस मसले पर संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियों ने राज्यपाल के जरिए अरुणाचल में अपने सियासी स्वार्थ साधने का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार को घेरा था। इन आरोपों को इस बात से भी बल मिला कि जब पांच सदस्यीय संविधान पीठ अरुणाचल के विधानसभा अध्यक्ष पद से बागी विधायकों द्वारा कथित तौर पर हटाए गए नबाम रेबिया की याचिका पर सुनवाई और राज्यपाल के विवेकाधिकार के दायरे से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों पर गौर कर रहा है तब बीच में वहां राष्ट्रपति शासन लगाने की अधीरता का क्या औचित्य है?

प्रधानमंत्री मोदी ने सत्तारूढ़ होने पर अपनी सरकार की प्राथमिकताएं गिनाते हुए केंद्र में अरुणाचल के सांसद किरण रिजिजु को गृहराज्यमंत्री बनाने के साथ ही ‘लुक ईस्ट’ नीति यानी पूर्वोत्तर को तवज्जो देने का इरादा जताया था। यह तवज्जो अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन के रूप में इतनी जल्दी सामने आएगी, ऐसा किसने सोचा था! इसमें दो राय नहीं कि राज्यपालों पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने या केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी के सियासी हित साधने के आरोप कोई पहली बार नहीं लगे हैं। केंद्र की सत्ता पर काबिज हर पार्टी या गठबंधन राज्यों में अपने ‘अनुकूल’ राज्यपालों को नियुक्त करते रहे हैं। अफसोस की बात यह भी है कि आज अरुणाचल के राज्यपाल और केंद्र को प्रदेशों में उनकी राजनीतिक भूमिका पर घेरने वाली कांग्रेस का रिकार्ड इस मामले में बहुत उजला नहीं रहा है। वह खुद निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त या अस्थिर करने के खेल खूब खेलती रही है। लेकिन कांग्रेस की अतीत की करतूतों को केंद्र की भाजपा सरकार अपने बचाव के लिए ढाल नहीं बना सकती। भाजपा के इस आरोप में दम हो सकता है कि अरुणाचल का संकट प्रदेश कांग्रेस में अंदरूनी असंतोष और बगावत का नतीजा है। लेकिन एक सत्तारूढ़ पार्टी के आंतरिक संकट का फायदा उठा कर संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाना किसी भी लिहाज से वाजिब नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा करना मुल्क के संघीय ढांचे को तो नुकसान पहुंचाएगा ही, पूर्वोत्तर में अपनी पैठ बढ़ाने के भाजपा के मंसूबों में भी पलीता लगाएगा।

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