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संपादकीयः नापाक मंशा

पठानकोट हमले की दुतरफा जांच पर हुई सहमति से मुकर कर पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच जारी शांति प्रक्रिया को फिर पलीता लगा दिया है।
Author April 9, 2016 02:19 am

पठानकोट हमले की दुतरफा जांच पर हुई सहमति से मुकर कर पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच जारी शांति प्रक्रिया को फिर पलीता लगा दिया है। इससे सरहद के दोनों तरफ मौजूद अमनपसंद लोगों का मायूस होना स्वाभाविक है, लेकिन पाकिस्तान के पुराने रिकार्ड को देखते हुए इसमें आश्चर्यजनक कुछ नहीं है। इससे हर बार की तरह फिर साबित हुआ कि उसकी दिलचस्पी संबंध सुधारने या संवाद का सिलसिला आगे बढ़ाने में नहीं, उलटे भारत पर आरोप मढ़ कर अपनी आतंक-पोषक नीतियों-कारस्तानियों से विश्व समुदाय का ध्यान हटाए रखने में ज्यादा है। दिल्ली में गुरुवार को पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित के बयान से इस नापाक मंशा की स्पष्ट पुष्टि होती है।

बासित ने न केवल पठानकोट हमले की जांच के लिए भारतीय दल के पाकिस्तान जाने पर बनी सहमति से कन्नी काटी, विदेश सचिवों की किसी संभावित बैठक से भी इनकार किया। उन्होंने कश्मीर का राग तो छेड़ा ही, यह सनातन पाकिस्तानी आरोप भी दोहराया कि भारत बलूचिस्तान में ‘दिक्कतें’ पैदा कर रहा है। इस सिलसिले में बासित ने भारतीय नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव के पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में पकड़े जाने का भी हवाला दिया, जबकि इस गिरफ्तारी और जासूसी के आरोपों को खुद पाकिस्तानी मीडिया का एक हिस्सा संदिग्ध बता रहा है।

बासित के बयान को भारतीय पक्ष के लिए ‘करारा झटका’ बताना हालांकि थोड़ा जल्दबाजी कहा जाएगा लेकिन पठानकोट हमले की पड़ताल के लिए भारत आए पाक जांच दल की वहां के मीडिया में लीक रपट में उलटे भारत पर मढ़े गए संगीन आरोपों से मोदी सरकार की पाकिस्तान-नीति सवालों के घेरे में तो आ ही गई है। यह अफसोस की बात है कि विदेश नीति के जिस मोर्चे पर वह अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटते नहीं थकती, उस मोर्चे पर नितांत पड़ोसी नेपाल और अब पाकिस्तान के मामले में उसे मुंह की खानी पड़ी है।

इसमें शक नहीं कि विभाजन के बाद से ही पाकिस्तान भारत के लिए एक दुखती हुई रग और संवेदनशील विषय बना हुआ है। जहां भारत आजादी के बाद एक मजबूत और परिपक्व लोकतांत्रिक राष्ट्र के तौर पर विकसित होने में कामयाब रहा है वहीं मजहब के आधार पर कृत्रिम विभाजन की कोख से जनमा पाकिस्तान आज भी भिन्न-भिन्न उग्र क्षेत्रीय पहचानों से जूझता, धर्मांधता, आतंकवाद, कबीलाई टकरावों से लहूलुहान, राजनीति, सेना और इस्लामी सत्ता-केंद्रों की रस्साकशी में फंसा एक विफल राष्ट्र बना हुआ है।

कोढ़ में खाज यह कि दुनिया में हुई अधिकांश आतंकी वारदातों के तार पाकिस्तान से जुड़े पाए गए हैं जिससे उसकी छवि आतंकवाद के निर्यातक की बन गई है। इसके मद््देनजर खुद को अमनपसंद दिखाने के लिए जहां वह भारत के साथ शांति-संवाद के पैरोकार की मुद्रा अख्तियार कर लेता है वहीं अवाम का ध्यान मुल्क की बदहाली से भटकाए रखने की खातिर कश्मीरकी आजादी की आड़ में भारत के विरुद्ध शत्रु-भाव को पालता-पोसता रहता है। यह भी दिलचस्प है कि इधर बासित ने दिल्ली में शांति प्रक्रिया को ‘निलंबित’ बताया तो उधर इस्लामाबाद में पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि दोनों देश विदेश-सचिवों की वार्ता की बाबत एक-दूसरे के संपर्क में हैं। यह विरोधाभास पाक में निर्णयकारी ताकतों के अंतर्विरोधों की ही अभिव्यक्ति है जो एक राष्ट्र को तौर पर उसकी विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाती है। यह एक गंभीर स्थिति है और अपनी पाकिस्तान नीति में भारत को इसका गंभीरतापूर्वक ध्यान रखना चाहिए। आखिर संबंध सुधारते या शांति-कपोत उड़ाते हुए हम बार-बार गहरी खाइयों में कब तक गिरते रहेंगे?

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