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जनसत्ता संपादकीय : आतंक के निशाने

यह कहना गलत नहीं होगा कि बीते सप्ताह बीएसएफ के काफिले पर हुआ हमला जहां घाटी में दहशतगर्दों की नई सक्रियता को बताता है वहीं आंतरिक सुरक्षा की बाबत अपेक्षित चौकसी में कमी की तरफ भी इशारा करता है।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 22:35 pm
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पहले भी सीमा सुरक्षा बल के काफिले कई बार आतंकवादियों का निशाना बने हैं। मसलन, पिछले साल अगस्त में ऊधमपुर में बीएसएफ के एक काफिले पर लश्कर-ए-तैयबा के दहशतगर्दों ने हमला किया था। उस हमले में बीएसएफ के दो जवान शहीद हो गए थे और एक हमलावर मारा गया था। बीएसएफ की गाड़ियों पर आतंकी हमलों के अनुभवों के बावजूद पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती गई। लिहाजा, यह कहना गलत नहीं होगा कि बीते सप्ताह बीएसएफ के काफिले पर हुआ हमला जहां घाटी में दहशतगर्दों की नई सक्रियता को बताता है वहीं आंतरिक सुरक्षा की बाबत अपेक्षित चौकसी में कमी की तरफ भी इशारा करता है। दिनदहाड़े घात लगा कर श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर बिजबहेड़ा के समीप किए गए इस हमले में बीएसएफ के तीन जवान शहीद हो गए, जबकि नौ अन्य घायल हो गए। तेईस गाड़ियों में सवार बीएसएफ के जवान छुट््टी के बाद अपनी ड्यूटी पर लौट रहे थे।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक ने इस बात के लिए उनकी तारीफ की है कि उन्होंने हमले के बाद बहुत संयम का परिचय दिया; आतंकियों ने घनी बस्ती की गलियों से घात लगा कर बीएसएफ के काफिले पर हमला किया था, पर बीएसएफ के जवानों ने नागरिकों को हताहत होने से बचाने के लिए जवाबी गोलियां नहीं चलार्इं। निश्चय ही, अपने तीन जवानों की शहादत के अलावा इस संयम ने भी बीएसएफ का मान बढ़ाया है। फिर भी यह सवाल रह जाता है कि अतीत के अनुभवों के बावजूद उनके सफर की बाबत सारी जरूरी सतर्कता क्यों नहीं बरती गई? आंतरिक सुरक्षा के खुफिया तंत्र को हमले की भनक क्यों नहीं लग पाई? चेकपोस्टों और नाकों पर निगरानी की व्यवस्था लचर क्यों साबित हुई?

दस दिन पहले भी आतंकियों ने श्रीनगर में दो अलग-अलग घटनाओं में तीन पुलिसकर्मियों की जान ले ली थी। तब यह माना जा रहा था कि तीन साल से घाटी में कोई बड़ी आतंकी वारदात न होने से सुरक्षा बलों में शायद कुछ निश्चिंतता का भाव आ गया हो, और इसकी कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन ताजा हमले को लेकर तो ऐसी कोई दलील नहीं गढ़ी जा सकती। पिछली दफा हमले के पीछे हिज्बुल मुजाहिदीन का हाथ होने का अनुमान जताया जा रहा था, और इस बार तो उसने खुद हमले की जिम्मेदारी अपने सिर ली है। अनंतनाग में विधानसभा उपचुनाव से पहले हुए इस हमले का मकसद सुरक्षा बलों का मनोबल तोड़ने के अलावा घाटी का माहौल बिगाड़ना व राज्य सरकार की परेशानी बढ़ाना भी रहा होगा। फिर, यह हमला ऐसे वक्त हुआ है जब घाटी में पर्यटन का सीजन है।

पर्यटन पर राज्य के बहुत-से लोगों की आजीविका निर्भर है और यह राज्य के राजस्व का एक बड़ा स्रोत है। जाहिर है, ऐसी घटनाएं अमन की राह में तो कांटे बिछाती ही हैं, लोगों के गुजारे को भी मुश्किल बनाती हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता उमर अब्दुल्ला ने बीएसएफ के काफिले पर हुए हमले को बिगड़ती कानून-व्यवस्था का संकेत बता कर महबूबा सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। पर यह सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है। यह आंतरिक सुरक्षा से संबंधित ढिलाई का संकेत है जिसे दूर करने के लिए बीएसएफ, सेना और पुलिस, सभी को सोचना होगा। आतंरिक सुरक्षा से जुड़े खु

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