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संपादकीयः फैसला और सबक

आखिरकार मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने अंडरवर्ल्ड सरगना अबू सलेम को 1993 के मुंबई बम विस्फोटों के मामले में पच्चीस साल के कारावास की सजा सुना दी।
Author September 8, 2017 02:53 am
करीमुल्ला खान को आजीवन कारावास तथा ताहिर मर्चेन्ट और फिरोज खान को फांसी की सजा सुनाई है।

आखिरकार मुंबई की विशेष टाडा अदालत ने अंडरवर्ल्ड सरगना अबू सलेम को 1993 के मुंबई बम विस्फोटों के मामले में पच्चीस साल के कारावास की सजा सुना दी। इसके अलावा, अदालत ने करीमुल्ला खान को आजीवन कारावास तथा ताहिर मर्चेन्ट और फिरोज खान को फांसी की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया अपनी चरम परिणति तक पहुंच गई। बेशक, यह इंसाफ की जीत है, पर यह बेहद खटकने वाली बात है कि इस मामले को तार्किक परिणति तक पहुंचने में इतना लंबा वक्त लगा। ताजा फैसला मुंबई के सिलसिलेवार धमाकों के चौबीस साल बाद आया है। यह सही है कि इस मामले की जांच प्रक्रिया और न्यायिक प्रक्रिया काफी पेचीदा थी। ढेर सारे सबूतों की छानबीन करने और सैकड़ों गवाहों के बयान लेने, उनसे जिरह करने के अलावा बहुत-सी बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ना, जिनके तार देश के बाहर तक फैले हुए थे, आसान काम नहीं था। 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार धमाके देश में आतंकवाद की सबसे बड़ी घटना थे, और अगर मारे जाने वालों की संख्या के लिहाज से देखें तो आज भी उसके बारे में वही बात कही जा सकती है।

इन धमाकों ने 257 लोगों की जान ले ली थी और कोई सात सौ से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। मुंबई ही नहीं, पूरा देश इस कांड से स्तब्ध रह गया था। आतंकवाद के सिलसिले में मुंबई के अंडरवर्ल्ड की इतनी प्रमुख भूमिका इससे पहले कभी सामने नहीं आई थी। दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेनन, याकूब मेनन से लेकर अबू सलेम तक, सब इसे अंजाम देने वालों में शामिल थे। इस मामले की सुनवाई का पहला चरण 2007 में ही पूरा हो गया था। तब अदालत ने याकूब मेनन सहित कोई सौ लोगों को सजा सुनाई थी। याकूब को फांसी की सजा दी गई। अबू सलेम और तीन अन्य के खिलाफ सुनवाई देर से शुरू हुई, क्योंकि इनकी गिरफ्तारी बाद में हुई थी। मुंबई धमाकों को अंजाम देने के लिए अबू सलेम ने हथियार और विस्फोटक मुहैया कराए थे। उसकी भूमिका और पहले आए फैसलों को देखते हुए उसे भी फांसी हो सकती थी। पर वह बाहर भाग गया था और पुर्तगाल में पकड़ा गया। पुर्तगाल समेत यूरोपीय संघ के देशों में मृत्युदंड पर प्रतिबंध है और वे बाहर के अपराधी को तब तक संबंधित सरकार को प्रत्यर्पित नहीं करते, जब तक यह पक्का आश्वासन न मिल जाए कि उसे मृत्युदंड नहीं दिया जाएगा। भारत की तत्कालीन सरकार ने न सिर्फ ऐसा आश्वासन पुर्तगाल सरकार को दिया बल्कि इसके लिए अपने प्रत्यर्पण कानून में आवश्यक संशोधन भी किया, और इसी के फलस्वरूप अबू सलेम को 2005 में भारत लाया जा सका।

बहरहाल, आतंकवाद के और मामलों की तरह इस मामले के भी तार सीमापार से जुड़े होने के तथ्य शुरू से मौजूद रहे हैं। धमाकों की साजिश रचने में अहम भूमिका निभाने वाले डोसा ने कुछ युवकों को हथियारों का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए पाकिस्तान भेजा था। सलेम जब पुर्तगाल में पकड़ा गया तो पाकिस्तान के ही फर्जी पासपोर्ट पर वहां रह रहा था। दाऊद का बरसों-बरस पाकिस्तान में छिपे रहना सबको मालूम है। लेकिन इसके साथ ही, आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी अपनी कमजोरियों पर भी ध्यान जाना चाहिए। इतने बड़े कांड की तैयारी काफी समय तक की गई होगी और इसमें काफी लोग शामिल रहे होंगे, जो जांच और न्यायिक कार्यवाही से भी जाहिर है। सलेम ने गुजरात से हथियार और विस्फोटक मुंबई पहुंचाए। किसी भी स्तर पर समय रहते साजिश की भनक क्यों नहीं लग पाई? जाहिर है, मुंबई कांड के कुछ सबक भी हैं।

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