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मनमानी के वाहन

दिल्ली में क्लस्टर बस की चपेट में आने से स्कूटी पर सवार दो किशोरों के गंभीर रूप से घायल होने की घटना ने सड़क हादसों को लेकर एक बार फिर कई सवाल खड़े किए हैं। कुछ साल पहले दिल्ली में ब्लू लाइन बसों की अराजकता को देखते हुए सरकार को उन्हें सड़कों से हटाने का […]
Author August 20, 2015 08:48 am

दिल्ली में क्लस्टर बस की चपेट में आने से स्कूटी पर सवार दो किशोरों के गंभीर रूप से घायल होने की घटना ने सड़क हादसों को लेकर एक बार फिर कई सवाल खड़े किए हैं। कुछ साल पहले दिल्ली में ब्लू लाइन बसों की अराजकता को देखते हुए सरकार को उन्हें सड़कों से हटाने का फैसला करना पड़ा था। तब सार्वजनिक परिवहन पर लोगों की निर्भरता और डीटीसी बसों की सीमित संख्या के मद्देनजर काफी तादाद में क्लस्टर बसें चलाई गर्इं।

पिछले कुछ समय से इन बसों में भी यातायात नियमों के प्रति जो घोर लापरवाही देखी जा रही है, वह ब्लू लाइन के खतरनाक दौर की याद दिलाने लगी है। सड़क पर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगाती इन बसों से आए दिन हादसे और जानमाल के नुकसान की खबरें आने लगी हैं। ताजा घटना में भी स्कूटी पर सवार दोनों बच्चों ने हेलमेट नहीं पहना था, जिसके चलते सड़क पर गिरने के बाद उन्हें गंभीर चोट लगी।

अगर बस चालक की लापरवाही से किसी की जान चली जाती है या फिर वह बुरी तरह घायल हो जाता है, तो उसके परिजनों या दूसरे लोगों का दुखी होना या उनका गुस्सा स्वाभाविक है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि कई बार लोग खुद भी सड़कों पर अपनी सुरक्षा को लेकर सचेत नहीं रहते? ताजा घटना में घायल दोनों बच्चों को उनके अभिभावकों ने आखिर किन वजहों से व्यस्त सड़कों पर इस तरह वाहन चलाने की छूट दे दी?

यह अकेला उदाहरण नहीं है। शहरों-महानगरों की सड़कों पर केवल मोटरसाइकिल नहीं, अक्सर लापरवाही से कार चलाते किशोरों को देखा जा सकता है। जबकि अठारह साल से कम उम्र के बच्चों का वाहन चलाना न केवल गैरकानूनी, बल्कि सड़क पर चलते दूसरे लोगों के साथ खुद उनकी जान के लिए भी खतरनाक है। लेकिन कई बार बच्चों के माता-पिता उन्हें साधन और सुविधाओं में कमी नहीं होने देने की दलील पर खुला छोड़ देते हैं और नाबालिग होने के बावजूद उन्हें गाड़ियां चलाने के लिए दे देते हैं। जाहिर है, इसकी मुख्य वजह जरूरत के बजाय दिखावा है।

जबकि यह सब जानते हैं कि बच्चे उत्साह में वाहन चलाते हुए आमतौर पर यातायात नियमों का खयाल नहीं रखते। नतीजतन, कई बार व्यस्त सड़कों पर सिर्फ तफरीह के फेर में बड़े हादसे भी हो जाते हैं। मुश्किल यह है कि तेजी से एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लोगों ने शायद यह सोचना भी छोड़ दिया है कि एक व्यक्ति के जीवन की कीमत क्या होती है। थोड़ी सावधानी से कुछ वक्त ज्यादा भले लग जाए, पर व्यक्ति के सुरक्षित घर पहुंचने की उम्मीद ज्यादा होती है। इसमें सरकार की भूमिका यह जरूर है कि वह यातायात नियमों पर अमल सुनिश्चित करे और इसका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, लेकिन लोगों को भी यह सोचना होगा कि अपने बच्चों को व्यस्त सड़कों पर वाहन चलाने की छूट देकर क्या वे दूसरे लोगों और खुद उनकी जान से नहीं खेल रहे हैं!

 

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