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जोड़े दिलों को

कुछ समय पहले ‘जिंदगी’ टीवी चैनल पर एक धारावाहिक देखते हुए कई बार ‘बुनियाद’ की याद ताजा हुई। 1980 के दशक के मध्य में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ ‘बुनियाद’ खूब लोकप्रिय हुआ था। जिंदगी चैनल पर आया ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ नामक ड्रामा पाकिस्तान में ‘दास्तान’ नाम से प्रसारित हुआ था। इसे दिखाने […]
Author July 22, 2015 08:12 am

कुछ समय पहले ‘जिंदगी’ टीवी चैनल पर एक धारावाहिक देखते हुए कई बार ‘बुनियाद’ की याद ताजा हुई। 1980 के दशक के मध्य में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ ‘बुनियाद’ खूब लोकप्रिय हुआ था। जिंदगी चैनल पर आया ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ नामक ड्रामा पाकिस्तान में ‘दास्तान’ नाम से प्रसारित हुआ था। इसे दिखाने पर कुछ लोग चैनल से नाराज हुए।

उनकी शिकायत थी कि इसमें हिंदुओं की प्रस्तुति गलत ढंग से की गई है। उनकी शिकायत पर ब्रॉडकास्टिंग कन्टेंट कम्पलेंट्स काउंसिल (बीसीसीसी) ने चैनल को नोटिस भी भेजा। बहरहाल, इन दोनों धारावाहिकों- ‘बुनियाद’ और ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ की कहानी के आखिर में उनके केंद्रीय पात्रों- हवेली राम और बानो के अहसास हैं। दोनों के सपने अलग थे। मगर अंत में दोनों ने यही महसूस किया कि जिस सपने के लिए वे लड़े, वह कैसे बिखर गया।

दरअसल, जिंदगी चैनल पर पिछले एक साल के दौरान कई बेहतरीन कहानियां देखने को मिली हैं। बरबस उन कहानियों में हमने अपने आसपास के किरदारों और घटनाओं को पाया। किसी दूसरे मुल्क की कहानियों में जब हम अपने समाज के अक्स देखने लगें, या उनमें खुद को ढूंढ़ने लगें तो बेशक उस ‘दूसरे’ समाज से एक जुड़ाव महसूस होने लगता है।

जिंदगी चैनल का ‘थीम स्लोगन’ भी यही है- ‘जोड़े दिलों को’। धारावाहिकों के लिए पाकिस्तान में प्रचलित शब्द ‘ड्रामा’ है। वीसीपी या वीसीआर के दौर में अक्सर मैं यह सुनती थी कि पाकिस्तानी ड्रामा बहुत अच्छे होते हैं। लेकिन तब वे आम भारतीय दर्शक को उपलब्ध नहीं थे। जिंदगी चैनल शुरू होने से यह कमी पूरी हुई है। इसका देखते-देखते बेहद लोकप्रिय हो जाना ही अपने-आप में काफी कुछ कहता है।

पाकिस्तानी धारावाहिकों की कहानियां इतनी लंबी नहीं होतीं कि वर्षों चलती रहें और ऊब पैदा करने लगें। लेकिन भारतीय दर्शकों के लिए इनकी अहमियत यह है कि ये पाकिस्तान के बारे में हमारे मन में बनी-बनाई अनेक धारणाओं को तोड़ती हैं। बेशक उनमें कई बार इस्लाम का महिमामंडन रहता है, लेकिन कट्टरपंथ और कठमुल्लापन के खिलाफ आवाजें भी वहां सुनाई पड़ती हैं।

हर पाकिस्तानी धर्मांध होता है, ऐसे पूर्वग्रहों पर ये कहानियां करारा प्रहार करती हैं। हमें नजर यह आता है कि वहां का पढ़ा-लिखा तबका तरक्कीपसंद है। सभी महिलाएं बुर्का नहीं पहनतीं। सिर पर दुपट्टा लेकर चलने वाली युवतियां नजर आती हैं, तो चे-ग्वारा की तस्वीर वाले कुर्ते भी वे पहनती हैं। वे बिंदास हैं और आधुनिक भी। दूसरी तरफ वहां के आम घरों की महिलाओं की मुसीबतें भी आम भारतीय परिवारों की स्त्रियों से बहुत अलग नहीं हैं। परिवारों में अधिकार-हीनता की जिस व्यवस्था से उन्हें यहां जूझना पड़ता है, वैसी ही जद्दोजहद वहां भी है।

भारत और पाकिस्तान में वैमनस्य का लंबा दौर रहा है। दोनों देशों के संबंधों पर युद्ध और आतंकवाद के साए हैं। सरकारों ने समय-समय पर संबंध सुधारने की कोशिशें कीं, मगर फासला बरकरार रहा। इसके बावजूद पाकिस्तानी पहनावे भारत में खूब लोकप्रिय रहे हैं। पाकिस्तान में बॉलीवुड के सितारे चमकते रहे और संगीत के तार जुड़े रहे।

खान-पान की पसंद सरहद के दोनों तरफ एक जैसी ही रही है। एक जैसी जुबान के कारण एक-दूसरे की बातें समझने में दोनों तरफ के लोगों को कभी दिक्कत नहीं आई। इसके बावजूद कि पाकिस्तानी उर्दू को फारसी की तरफ ले जाने और हिंदुस्तानी से उर्दू शब्द गायब करने की राजनीति दोनों तरफ होती रही।

मगर पाकिस्तानी धारावाहिकों को देख कर यही लगता है कि दोनों देशों के अवाम की सांस्कृतिक जड़ें इतनी समान हैं कि दरार और दुश्मनी के लंबे दौर भी उन्हें अलग नहीं कर पाए हैं। धारावाहिकों में हिंदी और संस्कृत शब्द वाले मुहावरों का कई बार इस्तेमाल मुझे चौंका गया। ऐसे में हिंदी और उर्दू को अलग करने की कोशिशें कभी बचकानी तो कभी शरारतपूर्ण महसूस होती हैं। मशहूर गजलनिगार दुष्यंत कुमार ने कहा था कि ‘उर्दू और हिंदी अपने सिंहासन से उतर कर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फर्क करना मुश्किल होता है।

मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा से ज्यादा करीब ला सकूं।’ कहा जा सकता है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का विमर्श सिंहासन से उतर कर आम जन तक पहुंचता है, तो उनके बीच के फर्क को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है। हवेली राम और बानो के सपने समान ढंग से टूटे। दोनों देशों के अवाम की रोजमर्रा की मुश्किलों की बुनियाद और उनसे उनके संघर्ष की दास्तान कमोबेश एक ही जैसी हैं।

पम्मी सिंह

 

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