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मोर्चे पर स्त्री

हम सभी को तकनीक इस्तेमाल ने सबल और सक्षम बनाया है, अभिव्यक्ति के लिए मंच दिया है तो दूसरी ओर महिलाओं के सामने मुश्किलें भी खड़ी की हैं।
Author March 8, 2017 05:19 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दीपाली तायड़े

दूरदराज के एक गांव से जब दिल्ली आई तब आंखों में कई सपने थे। अब भी हैं। लेकिन इस दौरान संघर्षों ने यह अहसास कराया कि हम जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें नागरिक होने के दो स्तर हैं। पहला और वर्चस्व का स्तर है पुरुष होना और दूसरा स्तर है स्त्री होना, जिसके लिए अमूमन हर ओर के रास्ते में कांटे बिछे हैं। समाज में नैतिकता के ठेकेदारों के दायरे से बाहर आकर जब खुद को अभिव्यक्त करने के मंच तलाश किए तो वहां भी सड़क पर नजर रखने वालों से लेकर इंटरनेट के सोशल मीडिया पर ट्रोल करने वाले स्त्री के पहरुए लगाम लगाने के लिए चुनौती बन कर खड़े थे। चारों तरफ लड़कियां इस चुनौती के सामने हैं। अपने घर में कंप्यूटर पर बैठ कर मैं कुछ कहती हूं तो उसके लिए मुझे ट्रोल किया जा सकता है, मुझे बलात्कार की धमकी मिल सकती है, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से किसी सुनियोजित भावनात्मक जाल या ‘हनी ट्रैपिंग’ में शिकार बनाई जा सकती हूं।
छोटे-छोटे गांवों और शहरों में जिन लड़कियों के अस्तित्व को चारदिवारी में कैद करके रखा गया था, वे आज किसी तरह दिल्ली जैसे महानगरों में पहुंच कर पहले से मजबूत होकर, अपने अधिकारों को जान कर समाज में अपनी भूमिका के बारे में पूछने, बोलने और तय करने लगी हैं। यह सिर्फ बराबरी की मांग है। शायद इसीलिए पितृसत्ता के सामने एक डर पैदा हो रहा है और स्वतंत्र व्यक्तित्व हासिल करती लड़कियां निशाने पर आ रही हैं। बोलचाल की बारीक भाषा से लेकर ताने, छेड़छाड़ या इससे भी आगे बलात्कार की धमकी तो कभी चरित्र प्रमाण पत्र के रूप में उनके सामने बाधाएं खड़ी की जा रही हैं। प्यार के नाम पर की जाने वाली धोखेबाजी, शादी के झांसे से बनाए गए यौन संबंधों के बाद महिलाओं को केवल देह के दायरे में बांध दिए जाने से लेकर धर्म, संस्कृति, परंपरा, जातिगत विद्वेष या धर्म से जुड़ी कर्तव्य-शिक्षाओं के रूप में स्त्री के व्यक्ति होने का दर्जा छीन कर उन्हें अलग-अलग स्तरों पर गुलाम बनाए रखने का प्रपंच रचा जाता है।

हम सभी को तकनीक इस्तेमाल ने सबल और सक्षम बनाया है, अभिव्यक्ति के लिए मंच दिया है तो दूसरी ओर महिलाओं के सामने मुश्किलें भी खड़ी की हैं। मसलन, फेसबुक के पोस्ट या इनबॉक्स में की गई बातचीत का किस हद तक किसी लड़की को पीछे धकेल दिए जाने के औजार के रूप में प्रयोग हो रहा है, इसके बारे में लड़कियों के अनुभव बेहद तकलीफदेह रहे हैं। कभी भरोसे में आकर की गई बातचीत, फोटो, वीडियो को यूट्यूब पर डालने की धमकी या ब्लैकमेलिंग किसी लड़की को आत्महत्या तक के लिए मजबूर कर सकती है। इनबॉक्स में किसी के मैसेज का जवाब नहीं देने पर लड़की को चरित्रहीन या वेश्या घोषित कर देना या उसे ट्रोल करना एक खास हथियार हो गया है।

आखिर क्या कहा था गुरमेहर कौर ने, जिसने समाज के सत्ता-तंत्र को डरा दिया? किसी से नहीं डरने की घोषणा क्या किसी को डराने का इतना बड़ा हथियार हो सकती है? गुरमेहर के नहीं डरने की मुनादी से डरे बदहवास लोगों ने उसकी जिस एक बात को उसके खिलाफ सामने किया, वह भी संयोग से केवल गुरमेहर की बात नहीं थी, बल्कि युद्ध के विरुद्ध दुनिया भर में एक सबसे महान मांग थी। युद्ध के खिलाफ स्त्री क्यों होती है, क्या इसे समझना पितृसत्ता के लिए कभी भी संभव हो सकेगा? लेकिन राष्ट्रवाद के पौरुष दंभ और सत्ता की कुंठा से जो निकल सकता था, वही गुरमेहर के लिए भी निकला और उसे बलात्कार तक की धमकी दी गई। सिर्फ इसलिए कि उसने चुप रहने के बजाय आवाज उठाने का चुनाव किया। अपने पिता की शहादत के बावजूद युद्ध और नफरत के खिलाफ अमन और प्रेम की पैरोकारी की। एक नए और सभ्य समाज का सपना पेश करती एक स्त्री की ऐसी बातों से किसे डर लग रहा था?

दलित पृष्ठभूमि से होने का दंश महसूस कर पाना उनके लिए शायद मुमकिन नहीं हो जो इसे दूर देख पाते हैं। इसमें भी लड़की हूं तो जातीय विद्वेष के बहादुरों के निशाने पर भी बहुत आसानी से लाई जा सकती हूं। जब गांव से निकल कर शहर में आई तो उस वक्त एक दब्बू किस्म की लड़की थी जो न अपने अधिकार जानती थी न आंखों में आंखें डाल कर सवाल कर सकती थी। ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता की दोहरी परतों की मार समाज में थी। यहां आधुनिक तकनीकी के प्रतीक सोशल मीडिया पर पढ़े-लिखे कथित प्रगतिशील दिखने वाले जातिवादियों के नए और सबसे कारगर अड्डे पर भी उनका सामना हुआ। एक तय पैमाने पर लड़कियों के खिलाफ ‘युद्ध’ लड़ा जा रहा है। लेकिन अब लड़कियां भी शायद मैदान छोड़ कर भागने के मूड में नहीं हैं। ‘तिनका ही सही वजूद तो हूं, हिल-हिल कर हवाओं का रुख दिखलाऊंगी।’
साल भर में एक दिन महिला दिवस मना कर लड़कियों के सपनों को दफ्न करने की कोशिशों में हिस्सा लेते हुए विकसित तो दूर, हम सभ्य देश होने की कल्पना भी छोड़ ही दें।

 

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