April 30, 2017

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कसौटी पर लिखना

लेखन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति को आनंद का अहसास होना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में वह आनंद इस होड़ में कहीं खो गया है।

Author April 5, 2017 03:14 am
प्रतीकात्मक चित्र

वक्त के साथ कैसे चीजों के संदर्भ और महत्त्व बदलते रहते हैं, यह पिछले कुछ समय से ज्यादा शिद्दत से महसूस हो रहा है। किसी विषय पर लिखते हुए मेरे मन में एक सवाल निरंतर चलता है कि मेरे लिखे को कोई पढ़ने वाला भी है या नहीं! मेरे लिए रोजाना अपने कॉलेज में विभाग के पुस्तकालय में जाना मुश्किल होता है। इसलिए महीने में तीन या चार बार ही वहां जाती हूं। पिछले महीने से अब तक जितनी बार भी पुस्तकालय में गई तो पाया कि वहां हर हफ्ते कोई न कोई सेमिनार या सम्मेलन चल रहा होता है। इन दिनों मुझसे मिलने वाला हर शख्स मेरे सामने एक सवाल के साथ आता है- ‘अच्छा… आप भी आज अपना ‘पेपर प्रेजेंट’ कर रही हैं कॉन्फ्रेंस में?’ मैंने जवाब में हर मर्तबा अपने व्यस्त होने के कारण देकर बात को टाल दिया। यह पूछने वाला चला जाता है, लेकिन वह प्रश्न मेरे पास ही रह जाता है।

कुछ समय पहले एक दिन विभाग के नोटिस बोर्ड पर कॉन्फ्रेंस में लेख प्रस्तुत करने वालों की सूची लगी थी। उसमें नामों को देख कर लगा कि विभाग का हर दूसरा विद्यार्थी अपना लेख प्रस्तुत करने वाला था। यह देख कर मुझे पता चला कि वह ‘पेपर प्रेजेंट’ करने वाला सवाल मुझसे क्यों किया गया था। यह भी पता चला कि एक ही दिन में कॉन्फ्रेंस समाप्त करने के लिए कई समांतर सत्रों का आयोजन किया गया है, ताकि लगभग डेढ़ सौ लोग अपना लेख प्रस्तुत कर सकें। उनमें से एक सत्र मुझे रुचिकर लगा तो उसे सुनने के लिए निर्धारित हॉल में पहुंची, जहां मेरे सहित कुल बीस लोग थे। इनमें से पंद्रह लोग अपना लेख प्रस्तुत करने वाले थे, दो आयोजक और दो लोग लेख प्रस्तुत करने वालों के दोस्त थे।

वहां बैठे अधिकतर प्रस्तुतकर्ता अपने लैपटॉप पर लेख के प्रस्तुतीकरण की तैयारी कर रहे थे। इस बीच बगल में बैठी एक लड़की ने मुझसे पूछा- ‘आपका कौन-सा नंबर है?’ यह सुन कर मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई, क्योंकि मैं वहां केवल एक श्रोता थी। यह स्थिति केवल इस हॉल तक सीमित नहीं थी। सभी में आमतौर पर केवल लेखक थे। उनके मूल्यवान विचारों को सुनने के लिए अलग से कोई पाठक या श्रोता वहां मौजूद नहीं था जो सुन कर अपनी राय बना सके या जाहिर कर सके। कई वजहों से हरेक विद्यार्थी और प्राध्यापक मजबूर होकर लिखने और प्रस्तुत करने की होड़ में शामिल हो चुके हैं। इसके चलते हर व्यक्ति या तो लिख रहा है या बोल रहा है।

एक प्रसिद्ध कहावत है- ‘अभ्यास एक व्यक्ति को पूर्ण बनाता है!’ हो सकता है कि अधिक से अधिक लिख कर एक व्यक्ति अच्छा लेखक बन जाए, लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि लेखन का महत्त्व तभी है, जब पाठक उस पर अपनी प्रतिकिया दें। लेखन के लिए एक महत्त्वपूर्ण शर्त यह है कि लिखते समय व्यक्ति यह ध्यान में रखता है कि उसका पाठक कौन है और अपने विचारों को किस प्रकार उस तक पहुंचाया जा सकता है? लेखन प्रक्रिया के दौरान बार-बार आने वाला यह खयाल लेखक को उसके लेखन को सुधारने में मदद करता है, जिससे लेख की गुणवत्ता में इजाफा होता है। लेकिन कुछ अनुभवों के बाद मैं कह सकती हूं कि दबाव में आकर लोग लेखन की प्रक्रिया के साथ बिल्कुल न्याय नहीं कर पा रहे हैं।

हस्तक्षेप और किसी विचार को ठीक से समझना और उसका अपनी समझ और आकलन के साथ पाठ करना एक बात है और केवल कहने के लिए खुद को लेखक के रूप में पेश करना दूसरी बात। हरेक व्यक्ति के लेखक और वक्ता बनने की होड़ में शामिल होने नतीजा यह हुआ है कि समाज में आलोचनात्मक सोच और चर्चा के रचनात्मक मंच लगभग खत्म होते जा रहे हैं। यह स्वाभाविक ही है कि इस मामले में पैदा हुई होड़ के चलते गंभीरता में गिरावट आई है और यह कम से कम लेखन के लिए एक चिंता की बात है।लेखन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति को आनंद का अहसास होना चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में वह आनंद इस होड़ में कहीं खो गया है।

अनुभव को संपूर्ण होने से पहले ही शब्दों में बयान करने के लिए लोग मजबूर हो चुके हैं। मैं भी यह नहीं जानती कि मैं किस पल इस होड़ का हिस्सा बन जाऊंगी। एक ओर दिमाग है जो कहता है कि बुद्धिमत्ता उसी को कहते हैं, जिसमें व्यक्ति समय और मांग के अनुसार खुद को ढाल ले, यानी इस होड़ में शामिल होकर अंकों को बटोर लेने पर ध्यान दे। दूसरी ओर दिल है, जो चाहता है कि अपने काम और लेखन की गुणवत्ता के साथ समझौता करके उसके आनंद को कम नहीं होने देना चाहिए। मैं नहीं जानती कि दिल और दिमाग की इस जंग में जीत किसकी होगी!

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First Published on April 5, 2017 3:14 am

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