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दुनिया मेरे आगे : कहां आए बसंत

वसंत उल्लास और उमंग का एक नाम है जो रोज भीतर उल्लसित होता है। लेकिन हमारे बीमार सपने वसंत को नहीं होने देते साकार।
Author नई दिल्ली | February 13, 2017 05:58 am
मौसम विभाग के मुताबिक पहलगाम, गुलमर्ग और श्रीनगर में हुई भारी बर्फबारी ने साल 2006 और 1992 के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। (AP File Photo)

पूरन सरमा

ठीक है कि इस बार वसंत देर से आया और इसका कारण प्रकृति ही है, लेकिन वसंत की चाह में उसकी बाट जोहने वाले भी अब कहां दिखते हैं! यों वसंत हर साल पेड़, पत्तों, फूलों और पूरे उपवन में जोर से खिलखिलाता है, मगर हम बेपरवाह अपने ड्राइंग रूम में बैठे भौतिक सुख-सुविधाओं में तलाशते हैं अपना वसंत! जबकि देर-सबेर वसंत ने आना नहीं छोड़ा है। वह जरूर आता है उस ठूंठ में भी, जो पूरे साल उदासीन और उपेक्षित-सा खड़ा रहा था। पछुआ जब वातावरण को छूने लगती है, तभी आकाश में बादल बन कर हल्की-सी बूंदा-बांदी होती है। यह खेतों की फसलों का प्राण है। इसी के बाद आता है इठलाता, बल खाता वसंत, जो प्रकृति और मनुष्य के रोम-रोम को पुलकित कर देता है। लेकिन हमारे अहसास बदल गए हैं। हम नई चकाचौंध में फंसे उसकी आहट नहीं सुन पाते। वसंत पल्लवन की अनदेखी ने जड़ता को जन्म दिया है और वातानुकूलित भवनों में वसंत के अक्स खोजने की लालसा लिए हम भटकते रहते हैं। अपने छल-प्रपंच के जाल में ही फंसा हमारा वसंत छटपटाता है बाहर आने को। लेकिन भुलावों ऐसे मकड़जाल बन गए हैं जिसमें वह एक निर्जीव-सी मकड़ी की तरह लटक कर काल का ग्रास बनता चला जाता है।

वसंत उल्लास और उमंग का एक नाम है जो रोज भीतर उल्लसित होता है। लेकिन हमारे बीमार सपने वसंत को नहीं होने देते साकार। इसी उधेड़बुन को हम दूसरे नाम भी दे सकते हैं। खून सनी मिट्टी में भला कहां से उगेगा या फूटेगा वसंत। सरसों के पीले फूलों को जब हवा छूती है और वे लचक कर गेहूं की बालियों पर झुकते हैं तो वह दृश्य किसे नहीं मोह लेता। लेकिन वर्षों बीते, देखे थे हमने खेल और वह गौरेया जो नीम की डाल पर किलकती रही है। माघ महीने की हल्की ठिठुरन का एक नाम भी है वासंती। यही वासंती आभास फागुन के लगते-लगते यौवन की दहलीज चढ़ने लगता है तथा वसंत के प्रसंग बदलने लगते हैं उत्सवों में। ये उत्सव कई नामों से जाने गए। फागोत्सव से लेकर मदनोत्सव तक। हम गांवों से दौड़ते-दौड़ते महानगरों की चौड़ी सपाट सड़कों पर हांफ रहे हैं और फिर भी दौड़े जा रहे हैं। फुरसत ही नहीं है हमें, धैर्य से हालात को समझने के लिए। हम सब रंगीन टीवी, शानदार भवनों, कारों, सोफे और वातानुकूलित सुविधाओं के विस्तार में डूबे हैं और वसंत इसी ऊहापोह में हमसे कहीं दूर निकल गया है। दिलचस्प यह भी है कि हमें इसका मलाल नहीं। कल यही होगा- जंगलों का विनाश, पर्यावरण और वन्यजीवन का नाश। फिर भला वसंत आएगा कहां? वह हमारे ड्राइंग रूम में तो आकर बैठेगा नहीं! क्या हमारे भीतर यह अहसास बचा हुआ है कहीं कि जिस वसंत की खोज में हम दूर की यात्राओं पर निकलने का दिखावा करते हैं, वह हमारे आसपास से आकर कैसे लौट जाता है अपनी राह! उसके इस तरह लौट जाने या फिर हमारे पास नहीं आने के जिम्मेदार क्या हम ही नहीं हैं!

नदियां जल की नहीं, हमारे मन की भी लगभग सूखी हैं। मन की नदी सूखने का परिणाम कितना घातक होता है, हमें पता नहीं है। पता भी नहीं चलता कि कब वसंत के पंख जल जाते हैं और हमारे बीच सहकार, सहयोग और पे्रम के राग दम तोड़ने लगते हैं। तमाशा रोज का है…! खुशहाली का समाजशास्त्र रचने के वहम में हम प्रपंच और छद्म से रचते हैं। हमारे जीवन के उत्सव इतने भर ही रह गए हैं कि हम एक-दूसरे को नीचा दिखाएं और अपने को सर्वशक्तिमान महामानव ठहराएं। कोयल क्यों नहीं गाती और मन की खुरदरी भूमि पर क्यों नहीं फूटती नवकोंपल, यह सवाल सबके लिए है, क्योंकि वसंत जीवन का ऐसा राग है जिसे सबको गाना है। नहीं गाया तो फिर आंखों से बहेंगे नीर और भाईचारे का नामोनिशान मिटेगा। लेकिन सुबह के भूले को हम अगर खोज लेते हैं अपना वसंत, तो भूले नहीं कहलाएंगे। भीतर की महानदी में आह्वान करना होगा उस अभियान का, जिसकी शुरुआत अभी बाकी है।
अभी न तो रात है और न दिन ही ढला है। उजास बाकी है यहां-वहां कोनों में। उसे ही समेट लिया जाए, वरना सारा सामान हमने विनाश का तो जुटाया ही है। इस नए गांव में नई पहचान की जरूरत है, जिसकी अपनी निजी खुशियां थीं। जागने, सोचने और समझने का यही समय है। अगर ऐसा नहीं है तो वसंत छूट गया है हमसे कोसों दूर। जलते हुए दीप जब बुझते हैं तो अंधकार को बहुत खुशी होती है। यही तब अट्टहास कर हमारी नादानियों की खिल्ली उड़ा रहा है। इतिहास जब सवाल करेगा, तब हम मौन और मूक होंगे। उसके सवालों का कोई जवाब नहीं होगा हमारे पास। इतिहास और पीढ़ी को बरगलाए जाने को लेकर फिक्रमंद नहीं हैं, तो फिर खुद को तैयार रखिए अपने ही बनाए यातना शिविरों में बंद हो जाने के लिए, वसंत आए या नहीं आए!

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