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दुनिया मेरे आगेः रोशनी की राह

जब अपने देश में लोगों को कम पढ़ा-लिखा माना जाता था, तब दिवाली जैसे त्योहार अपनी भावनाओं के साथ-साथ पर्यावरण की भी शुद्धता बनाए रखते थे। सभी लोग अपने घरों की सफाई करके रंग-रोगन करते थे।
Author October 29, 2016 01:34 am
दीपक( फाइल फोटो)

सुमेर चंद

जब अपने देश में लोगों को कम पढ़ा-लिखा माना जाता था, तब दिवाली जैसे त्योहार अपनी भावनाओं के साथ-साथ पर्यावरण की भी शुद्धता बनाए रखते थे। सभी लोग अपने घरों की सफाई करके रंग-रोगन करते थे। झोपड़ी में रहने वाली कोई अकेली बुजुर्ग महिला भी गोबर से लीप कर गेरू से चीतन निकाल अपने घर को सजाती थी। पक्के घरों में साफ-सफाई के बाद जंगली बोस के फूल बिखेर कर पूरा वातावरण सुगंधित बना लिया जाता था। मिट्टी के दीये जला कर घरों की मुंडरों पर रख दिए जाते थे। घर में चिलम जैसी मिट्टी की हाड़ी लाकर रख ली जाती थी। इसको बिनोलों से भर लिया जाता था और तेल डाल कर डंडे में टांग कर इसे मशाल बना लिया जाता था। बच्चे उन्हें उठा कर गली-गली जयकारा लगाते थे। बीस-तीस मशालों का नजारा बड़ा मनमोहक होता था। जिसके घर के दरवाजे पर जाते वहां बैठी घर की मालकिन सबकी बाल और डिड्डों पर थोड़ा तेल टपका देती थी, ताकि ये मशालें ज्यादा समय तक जलती रहें।


यह सब बताने का संदर्भ इसलिए जरूरी है कि इन दीयों और मशालों से वातावरण खराब नहीं होता था और हवा में जहर नहीं घुलता था। दिवाली सरीखे त्योहार की शुद्धता बनी रहती थी। नए वस्त्र, बढ़िया भोजन और हर ओर रोशनी, खुशी का संदेश चारों ओर घोल देती थी। सभी जीवधारियों का स्वास्थ्य पोषित होता था। ऐसा होने से इस त्योहार की सार्थकता बनी रहती थी, जिसकी राह सभी लोग बड़ी बेसब्री से तकते थे। हर एक चेहरा मुस्कराता था। स्वच्छ वायु का कण-कण मुस्कराता।
ये सारी बातें अंग्रेजों के यहां रहते तक कमोबेश थीं। आजादी के बाद हम अपनी आबोहवा को और बेहतर बनाने की ओर आगे बढ़ते। लेकिन अब हमारे पढ़े-लिखे होने के बाद हमें आधुनिकता की हवा भी लग गई। दादा-परदादा का रंग-ढंग पिछड़ेपन का प्रतीक लगने लगा। यह सब अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने की तरह था। उसके बाद हमने धीरे-धीरे फेंक दिए वे ‘पिछड़ेपन’ के रिवाज और भूल गए दिवाली की शुद्धता। अब दिवाली का मतलब हो गया है ज्यादा से ज्यादा कृत्रिम चकाचौंध और पटाखों के धमाके। इस कृत्रिमता और पटाखों ने कैसे हमारी उस दिवाली को गुम कर दिया, यह हमें पता भी नहीं चला।

यह सभी जानते हैं कि पटाखे बिना बारूद के नहीं बनाए जा सकते। बारूद को कागज की कई तहों में लपेट कर पटाखे बनाए जाते हैं। जब इस बारूद में आग लगाई जाती है, तब वह कानफोड़ू आवाज के साथ विस्फोट करता है और जहरीले धुएं का रूप धारण कर लेता है। यह कानफोड़ आवाज एक ओर ध्वनि प्रदूषण फैलाती है और दूसरी ओर जहरीला धुआं हमारी सांस लेने वाली वायु में घुल जाता है। चूंकि हमने खुद को आधुनिक मान लिया है, इसलिए सच्चाई पर विचार करने को भी हम पिछड़ापन कहने लगे हैं। अब तो इस मौके पर नए वस्त्रों से लेकर स्वादिष्ट त्योहारी भोजन का खयाल भी गायब होता जा रहा है। वातावरण की शुद्धता का तो सवाल ही सबको बेमानी लगता है। बस एक ही बात को लोगों को याद है कि दिवाली की भावना और शुद्धता कैसे बर्बाद हो, सभी जीवधारियों के स्वास्थ्य को हानि कैसे पहुंचे। कई दिन पहले से पटाखे फोड़ने शुरू कर दिए जाते हैं। इस काम में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता है। जो भी ज्यादा और जोरदार आवाज के विस्फोट वाले पटाखे छोड़े वह खुद को सबसे बड़ा मान लेता है।

दरअसल, दिवाली के बहाने सब अपना गोला-बारूद हाथ में लिए एक ही बात सोचते रहते हैं कि आज सबको पीछे छोड़ देना है। त्योहार के नाम पर बनाए गए इस ‘युद्ध’ में ठांय-ठांय की आवाजें और बारूदी धुएं के बादल सारे वातावरण पर राज करने लगते हैं। ‘हम किसी से कम नहीं’ की भावना ज्यादा पटाखे चलाने के लिए उकसाती है, भले ही खुद के घायल होने की नौबत आ जाए या फिर किसी के लिए जानलेवा बन जाए। यह सभी जानते हैं कि पटाखा छोड़ने के बीच सांस भी जल्दी-जल्दी लेना पड़ता है और सारा जहरीला धुआं वहां मौजूद व्यक्ति के भीतर चला जाता है। इस प्रकार का जहरीला धुआं फेफड़ों में जाकर क्या असर करेगा, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं हैं। अफसोस यह भी है कि घर के बुजुर्ग, शिक्षक, समाज के अगुआ अपने आसपास के लोगों को इस सबके लिए समझाना या जागरूक करना जरूरी नहीं समझते हैं। बल्कि कई बार वे खुद इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। अगर दिवाली के नाम पर धमाकों और धुएं के नुकसान को लेकर ये लोग अपने घर के बच्चों और आसपास के युवाओं को समझाया जाए और खुद इस पर अमल करके उदाहरण पेश किया जाए तो थोड़ा देर से सही, लेकिन सभी समझेंगे। शायद तभी दिवाली फिर से अपने अर्थों में सब तरह रोशन होगी।

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