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दोहरी जिम्मेदारी का वक्त

समाज सामुदायिक भावनाओं की वह इकाई है, जिसके व्यापकता ग्रहण करने पर राष्ट्रीय स्वरूप सामने आता है। सामाजिक संदर्भों में समाज की रचना एक समन्वित सोच को पुष्ट करती और एक चेतनाशील विचार बिंदु को उभारती है..
प्रतीकात्मक तस्वीर।

समाज सामुदायिक भावनाओं की वह इकाई है, जिसके व्यापकता ग्रहण करने पर राष्ट्रीय स्वरूप सामने आता है। सामाजिक संदर्भों में समाज की रचना एक समन्वित सोच को पुष्ट करती और एक चेतनाशील विचार बिंदु को उभारती है। इस विचार के समन्वय से समाज में ठोस जागृति का भी स्वर बनता है, जो साहित्य के रूप में साहित्यकार दर्ज करता है। साहित्यकार, समाज और सरकार, इन तीनों इकाइयों से सामुदायिक विकास का मार्ग ही नहीं, एक खुशहाल जीवन का व्यापक फलक भी तैयार होता है। साहित्यकार की भूमिका दोहरे रूप में भी समाजोपयोगी है। एक तो वह दायित्वशील व्यक्ति के रूप में दिखता है, दूसरे वह समाज के लिए जो लिखता है, वह परोपकारी होता है। इसके अलावा वह सम-सामयिक संदर्भों की व्याख्या कर भले-बुरे के अर्थ का खुलासा करता है।

अब सवाल है कि सरकार कैसे साहित्यकार और समाज के लिए मददगार बने! सरकार के कार्यक्रम और नीतियां रचनाकार की कसौटी पर किस रूप में खरी उतरती हैं। वह परहित में सरकारी योजनाओं को अपने विचार बिंदु पर तौलता-नापता है, तब सृजन का जो पुण्य प्रस्फुटित होता है, वह सरकार और समाज के लिए उपयोगी संदर्भ बन कर भविष्य की कार्यशैली को प्रभावित करता है। दरअसल, साहित्य कई तरह के भेद को समझाने का एक माध्यम है। अब मनुष्य इसे पढ़ता है तो समाज की असंगतियां भला कैसे अपने स्वरूप में बनी रह सकती हैं।

सवाल मौजूदा हालात में साहित्यकार के दायित्व में समाज और सरकार की भूमिका के आकलन का भी है। क्या साहित्यकार जो कुछ लिख रहा है, वह बुनियादी है या उसके सृजन का लक्ष्य सबके सुख की कामना है? इस दोहरे दायित्वों में सफल होने के बाद ही उसकी रचनाएं नव-निर्माण का काम कर पाती हैं। साहित्यकार सुविधायोगी बन कर जब सरकारी षड्यंत्र में सम्मिलित हो जाता है, तब यह समाज के लिए अनर्थकारी होता है। साहित्य की धुरी जब चलती है, तब समाज और सरकार का स्वरूप अपने आप स्पष्ट होने लगता है। तब यह भावनात्मक संकुचन नहीं रहता और विवेकशील संभावनाएं जड़ता को मिटाती हैं।

सामाजिक संवेदनाओं में प्राण का प्रस्फुटन भी साहित्य की गतिशीलता से होता है। वे संवेदनाएं इतनी कोमल होती हैं कि इनके प्रति बरती गई जरा भी उदासीनता लक्ष्य से भटकाने के लिए पर्याप्त होती हैं। सांस्कृतिक जीवन की परंपरावादी विरासत को जो धरातल मिलता है, वह समाज से ही मिलता है। अन्यथा समय की गति इस विभ्रम को ठहरने नहीं देती और मान्यताएं बदलती रहती हैं। मसलन, किताब कभी मरती नहीं और अपने साथ समय की तमाम विशेषताओं और विसंगतियों को साथ लेकर चलती है। साहित्यकार की दृष्टि से वह सब छूट नहीं पाता, जो सामान्यतया अनदेखी का शिकार रहता है। इसी चौकसी और सजगता से वह समाज और सरकार की आंख बन जाता है।

सरकार की कार्य-प्रणाली जनकल्याण का मुख्य आधार है। उसमें जो विकार बनते हैं, वह मनुष्य द्वारा मनुष्य का ही घोर विरोधी स्वरूप है। लेकिन इसे रोका इसलिए नहीं जा सकता, क्योंकि संवेदनाएं जड़ता को ग्रहण करती हैं और आत्मकेंद्रीयता बलवती होकर स्वार्थों को समर्पित हो जाती है। तब सरकार का भावनात्मक स्वरूप विनष्ट हो जाता है। फिर समाज और साहित्यकार इस विकृति को समझ कर सुधार के लिए सरकार को विवश करते हैं कि वह सामुदायिक विकास के मार्ग से विमुख न हो।

साहित्यकार की कोई एक पुस्तक समाज में उथल-पुथल और सामाजिक बदलाव का जब कारण बनती है तो साम्राज्यवादी ताकतें भी नहीं ठहर पातीं। रूस और फ्रांस की क्रांतियों में साहित्य ने इतिहास का ऐसा पृष्ठ तैयार कर दिया, जिसमें साहित्य या विचारों का प्रभाव सदियों तक सुरक्षित रहेगा। यह विचार शक्ति जो बदलाव, क्रांति या खुशहाल जीवन की प्राप्ति का साधन बनती है, वह ऐसी संचित निधि है, जो सामाजिक सरोकारों को हर कोण से आकर्षित करती है। वर्तमान दौर में समाज और सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है तो साहित्यकार की अनदेखी ने एक मिली-जुली अराजकता को पनपाया है। यह तो स्पष्ट है कि भौतिक लालसाओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को चौपट किया है। सभी ने अपनी भूमिकाओं को भुलाया है। एक ऐसा तंत्र सामने आया है, जिसमें जीवन संघर्ष शक्तिशाली के लिए कम हो गया है और छोटे जीव खुद को बचाने में विफल और असहाय हो गए हैं।

साहित्यकार को इसे समझ कर विकृतियों के लिए नए कारगर ढंग से सोचना होगा। समय का फेर बस यह है कि जीवन मूल्य बदल गए हैं, जिससे मानव मूल्य भी विघटन को तत्पर हैं। बस इसी को साधना है सरकार-साहित्यकार और समाज को। वरना जो स्थितियां बनेंगी, वे भयावह होंगी। साहित्यकार की भव्यताएं इन्हीं में निहित हैं कि वह बेहतर समाज रचना की कल्पना यथार्थवादी स्वरूप में आमजन के गले उतारे। उसी में व्यापक मानव कल्याण सन्निहित है।

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