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दुनिया मेरे आगेः समय से संवाद

समय कब इतिहास हो जाता है, यह पता ही नहीं चलता। लेकिन यह भी सच है कि समय की नब्ज पहचानने वाले ही सफलता की मंजिलें तय कर सके हैं।
Author October 18, 2016 03:08 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

कृष्ण कुमार रत्तू

समय कब इतिहास हो जाता है, यह पता ही नहीं चलता। लेकिन यह भी सच है कि समय की नब्ज पहचानने वाले ही सफलता की मंजिलें तय कर सके हैं। हालांकि समय से संवाद किसका होता है, यह सोचने का विषय हो सकता है। लेकिन शाश्वत सच तो यह है कि समय ही आपसे संवाद रचाता है। आदमी तो महज उसी संवाद की परिक्रमा में अपनी जीवन यात्रा को पूरा करता है। इन दिनों जिस समाज में हम रह रहे हैं वह एक ऐसे समय में निर्मित हो रहा है, जिसमें सृजन की नई परिभाषा मनुष्य द्वारा लिखी जा रही है। इसी को शास्त्रों में समय का काल-चक्र कहा गया है।
आज के आधुनिक कहे जाने वाले समाज में बीता हुआ समय हमें हमारे पूर्वजों के इतिहास और तहजीब, संस्कृति और विरासत की बानगी दिखाता है। यों ही बीतते हुए समय को पकड़ने का दंभ हममें से बहुत लोग करते हैं। लेकिन यह समय का संवाद है कि आपकी हार तब होती है, जब आप समय के साथ चल नहीं पाते। यह हर उस व्यक्ति को ठीक से समझ में आता है जो अपने बीते हुए को याद करते हुए कभी कहता है कि काश कि उस वक्त मैंने फलां काम कर लिया होता…! यानी वक्त ने आपसे संवाद करने, उसी समय अपनी जरूरत बताने की कोशिश की, लेकिन आपका ध्यान कहीं और था या आपने ध्यान देना जरूरी नहीं समझा। लेकिन भविष्य में इसका हासिल बताता है कि उन पलों का महत्त्व क्या था!

समूचा बदलता हुआ समाज, देश और विश्व समय से शायद उस तरह से संवाद नहीं कर पा रहा, जिस तरह से समय की अवधारणा है। गति के साथ उसकी पहचान व्यक्ति को उसका साथी बनाता है। एक सच यह भी है कि जिन देशों और समाज ने समय को वक्त रहते नहीं समझा, सीखा और व्यवहार में अनुकूलता के साथ नहीं उतारा, उनका इतिहास में कोई नामलेवा नहीं है। हमारे तेजी बदलते हुए भारतीय समाज की विडंबना यह भी है कि हम न तो समय की तीव्रता और जरूरत को देख कर उसके साथ कदम मिला कर चल पाते हैं और न ही समय के साथ उसके महत्त्व के पलों में संवाद कर पा रहे हैं। देश में सरकारें आती हैं और चली जाती हैं। सत्ता में आने के लिए जनता को लुभाने और अपने पक्ष में करने के मकसद से झंडे, नारे, नोट और वोट का खेल चलता रहता है। संसद में जेरे-बहस बहुत कुछ सामने आता रहता है। पिछली आधी सदी से ज्यादा से शायद यही हमारा समय का संवाद है। हम अगर इसी का मूल्यांकन करने बैठें तो समझ में आ जाएगा कि हमारा यह संवाद कितना सार्थक रहा और कितना वक्त हमने निरर्थक गंवाया।
बदलते भारतीय समाज में भारतीयता सीमित हो रही है। देश को जहां सभी सामाजिक और धार्मिक सीमाओं को तोड़ कर मनुष्यता के समाज का भूगोल बनना चाहिए था, वहां यह जाति, धर्म और कुनबे के आधार पर अलग-अलग खेमों में बंट रहा है। असहिष्णुता और सहिष्णुता में उलझा हुआ समाज मंदिर और मस्जिद के मुद्दे से राजनीतिक रोटियां सेंकते दलों का पाखंड होकर रह गया है। आखिर समाज किससे संवाद करे! समय है कि अपनी गति से चलता हुआ अपनी निरंतरता और वेग में और ज्यादा प्रखर हो रहा है और दूसरी ओर समाज उसकी गति को पहचान पाने में शायद और भी कमजोर होता जा रहा है। जाहिर है, समय का समाज के साथ संवाद टूट गया है। अब आम साधारण जमीन का आदमी किस समय के साथ संवाद करे!

इन दिनों बदलता जनमानस भारतीयता के शायद उस संवाद की तलाश में है जो सूचना प्रसारण और मीडिया की चकाचौंध और आकर्षण के साथ ‘ब्रेकिंग न्यूज’ का संवादी हो गया है। बदलते समाज के सारे रिश्ते अब फेसबुक, ट्विटर और वाटसऐप जैसे सोशल मीडिया के मंचों तक सीमित हो गए हैं। यानी आपका संवाद सूचना की इस नई प्रौद्योगिकी में शून्य हो गया है। अब कहां से ढूंढ़ें बूढ़े मां-बाप की दुआएं और कहां से आए प्रणाम की आवाज! अब तो सूने गांव में भी कोई नहीं जाता। खाली उदास कच्ची मिट्टी के खंडहर होते घरों में उदासी का ऐसा गहरा आलम है कि संवाद खत्म हो गया है।
सूचना के इस तेज-तर्रार बदलते परिदृश्य में समय की रफ्तार को तो तय कर सकते हैं। लेकिन शायद संवाद टूट गया है। यही समय का सच है। यह अब आप पर है कि आप इसे मानें या नहीं माने।

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First Published on October 18, 2016 3:08 am

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