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दुनिया मेरे आगेः उन बादलों के नाम

मेरा चांद डूबा नहीं था, बस छिप गया था। चांद पर बैठी बूढ़ी अम्मा न जाने कब से चरखे पर सूत कात रही थी।
Author May 6, 2017 03:04 am

 निधि सक्सेना

मेरा चांद डूबा नहीं था, बस छिप गया था। चांद पर बैठी बूढ़ी अम्मा न जाने कब से चरखे पर सूत कात रही थी। एक बार जो मैंने उसकी कताई की उम्र गिननी चाही थी, तो मेरी सब उंगलियां और उनकी हर मोड़ पर पड़ी रेखाएं कम पड़ गर्इं! बल्कि उंगलियों की दरारें भी! उसका काता सूत क्या नाप पाती, धरती के सब बिलांद भी मिल कर पूरे न पड़ते। अम्मा तो हमेशा की बूढ़ी थी। मेरे बचपन में बूढ़ी और मेरी दादी के बचपन में भी बूढ़ी! मेरा चांद डूबा नहीं था, बस छिप गया था!
हुआ यों कि सूत कातती अम्मां से कोई गोला लिपटते वक्त गिर गया होगा। है भी तो कितनी बूढ़ी! उंगलियां सितार के तार की तरह कांपती होंगी, गुजरती नाव से जैसे पानी कांपता है, जैसे सर्दी में थरथराते हैं होंठ! ऐसी उंगलियों से गोला लिपटते कभी तो फिसलना ही था! वह गोला मेरे चांद से लिपट गया। गिरते हुए गेंद की तरह उछलता और लुढ़कता जाता होगा। है भी तो सड़क मेरे चंदा की ऊबड़-खाबड़ (जैसे मुक्तिबोध के चांद का मुंह टेढ़ा है)! कभी इधर ढुलकता कभी उधर फिसलता। दिशाओं के भ्रम में उलझ गया और फिर गोले का गुच्छा हो गया।
अब जो लगता है न कि बादल के पीछे छिपा है चांद! वह बदली नहीं, दरअसल उसी सूत का गुच्छा है। वे जो बादल हैं न गरजने वाले, जो बिन बरसे तैर जाते हैं! सब नानी के हाथों से छूटे गोले हैं सूत के। हम यों ही उम्मीद बांध लेते हैं, राह ताक लेते हैं! अब जो बादल हैं नहीं, वे बरसेंगे कैसे! सूत के दुशाले हैं वे तो! हमारे आकाश में आते हैं तो उन्हें यहां आने से हवा रोक लेती है।
ओ अम्मां! अब अपना गोला उठा लो! सुनती हो..अपना सूत सुलझा लो! गुच्छे से फिर गोला बना लो!
यों ही रात भर आकाश ताकते आंख थक गई! यों ऊबी कि न जाने कब आंख लग गई! नजर भर न चांद मिला… न प्यास भर बरसात। अम्मां! जानती हूं कि चरखा लगातार कातते हुए तुम थक जाती होगी! जानती हूं कि चांद का रंग तुम्हारे सूत की वजह ही से सफेद है…! जानती हूं कि बाल तुम्हारे उस सूत से भी तेज रोशन हैं…! जानती हूं कि तुम खुद गड़बड़ा जाती हो- कहां बाल शुरू, कहां सूत, कहां चांद बिछा! हो भी तो अकेली! रोज देखती हो धरती, लेकिन चांद से टेलीफोन भी नहीं कर पाती। फिर भी सोचो न! मैं आकाश के बादल देख छाता लेके जाती हूं, थैले का बस वजन बढ़ाती हूं। बारिश को न उस दिन आना होता है, न आती है! सूत का उलझा गुच्छा कभी बरसा है भला? और जब बदली देख कर भी बिन रेन कोट के बाहर जाती हूं कि बिन मौसम की बरसात होगी, दरिया खुद आकर मुझसे लिपट गया हो, ऐसी नहाई हुई वापस आती हूं।

कागज के किनारे मिला कर चार तह में लपेटा है! फिर कंचा बांध कर चांद की तरफ मैंने उछाल दिया। गुरुत्वाकर्षण ऐसा भी कोई सख्त न था कि मेरे पैगाम की कीमत न समझता। मेरी चिट्ठी कोई सेब तो थी नहीं! उसके माथे पर पूरा पता लिखा था चांद पर चरखे वाली अम्मा का, सो मैंने कुछ समय राह भी देखी। लेकिन चिट्ठी कभी नीचे न गिरी।
कुछ रातों से मैंने मुंह तक चादर नहीं ओढ़ी, और रात भर चांद को ताका। मैं तो भूल भी गई थी एक उनींदी सुबह। दूब पर ओस की जगह चांद से जवाब आया है- जवाबी पोस्टकार्ड साथ नहीं टंका। अम्मा ने जरूर चांद से झुक कर झांका होगा और फिर चिट्ठी को गिरा दिया होगा। उसने लिखा है- ‘भीग जाती हो तो क्या है? नमक की थोड़े ही बनी हो जो गल जाओगी। तुम्हारे मोहल्ले की कुछ छपाक-छपाक की आवाजें चांद तक सुनती हूं… कबसे! कितना मन करता है, कभी यों कूदने का! लेकिन आह! यहां तो कभी रिमझिम फुहार हुई ही नहीं। बारिशों में भीगा करो। बारिशें हमेशा हर जगह नहीं होतीं, सूखी धरती की दरारें वहीं हैं, उन झुर्रियों से पूछना कभी!
चांद वाली अम्मा भी मेरी दादी की तर्ज पर, पुराने पत्तों की तरह कुरकुरी बात करती है।
एक रोज मैं बस स्टॉप पर अपना छाता भूल आई। पीछे डूबती आवाज में कोई पूछ रहा था- ‘किसी का छाता छूट गया है!’

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