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दुनिया मेरे आगेः परिवेश का पाठ

बारिश का मौसम था। मैं उत्तराखंड के उधमसिंह नगर में बाजपुर ब्लॉक के एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में गया था।
Author April 1, 2017 02:14 am
बारिश का मौसम था। मैं उत्तराखंड के उधमसिंह नगर में बाजपुर ब्लॉक के एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में गया था।

प्रियवंद

बारिश का मौसम था। मैं उत्तराखंड के उधमसिंह नगर में बाजपुर ब्लॉक के एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में गया था। महोली जंगल से सटे हुए इस विद्यालय का आधा प्रांगण ‘तरणताल’ बना हुआ था। विद्यालय में प्रवेश के लिए थोड़ा घूम कर जाना पड़ा। प्रधानाध्यापक किसी रजिस्टर में आधे से ज्यादा डूबे हुए थे। सहायक अध्यापक लगभग भागते हुए अलग-अलग कक्षाओं में बच्चों को काम दे रहे थे, क्योंकि उन्हें प्रधानाध्यापक महोदय की मदद करनी थी। सलाम-दुआ के बाद बमुश्किल मिनट भर प्रधानाध्यापक मुखातिब हो सके। वे फिर रजिस्टर में थे। रजिस्टर के प्रति उनकी सघन आत्मीयता को देखते हुए फिलहाल मैंने चुपचाप भागते हुए सहायक अध्यापक को देखते रहना ही उचित समझा। लेकिन कब तक? आखिर वे मिल्खा सिंह तो हैं नहीं कि इन्हें भागते हुए देखना अच्छा लगता! एक शिक्षक साथी को इस तरह भागते हुए देखना तकलीफ पैदा करता है। मैंने एक बार फिर रजिस्टर की साधना में लीन प्रधानाध्यापक की तरफ एक भरपूर निगाह डाली और साथी शिक्षक की तरफ बढ़ चला। मैंने कहा कि हेड सर व्यस्त हैं तो सोचा कि आपके साथ ही थोड़ी बातचीत कर ली जाए। यह कहते हुए मैं कक्षा में पहुंच चुका था। यह कक्षा तीन थी। सहायक शिक्षक बच्चों को ‘सरल’, ‘कमल’, ‘महल’ जैसे शब्दों को श्यामपट्ट पर लिख कर उतारने का काम दे रहे थे। इतनी देर में मैं यह देख चुका था कि वे जिस कक्षा में जा रहे थे, उसमें थोड़ी देर के लिए शांति कायम हो जा रही थी। लेकिन जैसे ही वे दूसरी कक्षा में जाते, बच्चों का शोर बाहर आ-जा रहा था।

ऐसा लगा कि बारिश का माहौल, बच्चों का मिजाज और शिक्षक साथी की कोशिशें मेल नहीं खा रही हैं। मैं कक्षा से संबंधित किसी योजना से नहीं गया था, लेकिन परिस्थितियां इस बात की पैरवी कर रही थीं कि मैं थोड़ा समय कक्षा में भी दूं। मैंने उन सहायक शिक्षक से अनुरोध किया कि अगर आप कहें तो मैं थोड़ी देर बच्चों से बात करता हूं, तब तक आप दूसरे शिक्षक की मदद कर सकते हैं। वे सहर्ष तैयार हो गए, उन्होंने बच्चों से भी कह दिया। कक्षा तीन के बच्चे और मैं आमने-सामने थे और दूसरी कक्षा के बच्चों की बहुरंगी आवाजें अभी भी बहती हुई आ रही थीं। मैंने इजाजत ली सभी बच्चों को एक ही कमरे में बुला लिया।

सभी कक्षाओं को मिला कर कुल सैंतीस बच्चे थे। थोड़ी देर तक बच्चों से बातचीत के बाद बच्चे अब सहज हो रहे थे। फिर मैंने पूछा कि कहानी सुनना किसको-किसको पसंद है? सभी ने जोर से कहा कि सबको पसंद है। मैंने सबसे कोई कहानी सुनाने को कहा। इसके बाद बच्चे फिर संकोच में आ गए। थोड़ी देर तक उन्हें सहज करने का फिर से प्रयास किया तो कुछ बच्चों ने कहानी की जगह कविताएं सुनार्इं। मैंने उन्हें यह बताने की कोशिश की कि आप लोगों ने जो सुनाया, वह तो कविता थी। किसी को कोई कहानी याद है? सभी बच्चे चुप हो गए। उनकी चुप्पी को देखते हुए मैंने कहा कि चलिए… मैं आप लोगों को एक कहानी सुनाता हूं। सभी बच्चे एकदम से खुश हो गए।

मैंने खरगोश और शेर वाली कहानी सुनाई जिसमें बूढ़ा शेर रोज एक जानवर खाने का फैसला करता है। जंगल के सभी जानवर इस बात से परेशान थे। अंत में खरगोश ने अपनी चतुराई से शेर को कुएं में गिरा दिया और शेर मर गया। कहानी सुनने-सुनाने के दौरान जंगल के जानवरों, पेड़-पौधों आदि पर भी लगातार बातचीत होती रही। कुछ बच्चों ने बीच-बीच में ही जानवरों के साथ अपने अनुभव भी साझा किए। किसी ने बताया कि कैसे एक बार कुत्ता पीछे पड़ गया था तो किसी ने बंदरों से संबंधित घटना बताई।

इस तरह खरगोश और शेर की कहानी काफी देर तक चलती रही। कुछ बच्चे जिन्होंने यह कहानी पढ़ रखी थी वो बढ़-चढ़ कर कहानी के आगे की घटनाएं बता रहे थे। अंत में शेर कुएं में कूद जाता है… फिर जंगल के सभी जानवर खुश हो जाते हैं। इसी बीच सहायक शिक्षक ने आकर बताया तब पता चला कि दोपहर के भोजन का वक्त हो चला है। बच्चों से बातचीत में समय का अंदाजा नहीं लगा। मैंने बच्चों से कहा कि आप लोग खाना खाइए और यह पता लगाने की कोशिश कीजिएगा कि और कौन-कौन से जानवर क्या खाना पसंद करते हैं। बच्चों से विदा लेकर मैं कक्षा से निकल रहा था कि इस बीच कक्षा तीन के छात्र मंजीत ने अचानक से कहा- ‘शेर अभी मरा नहीं है सर जी!’ मैं थोड़ी देर तक उसकी तरफ देखता रहा। फिर मैंने पूछा कि क्यों? उसने कहा कि अभी कल रात ही हमारे गांव से एक बच्चे को उठा कर ले गया है!
मैं कहानी और मंजीत के परिवेश के बारे में सोचता रहा!

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