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विज्ञान में कहानी

पृथ्वी की सुरक्षा के लिए भारतीय ज्ञानियों की निरंतरता का अद्भुत उदाहरण अनायास जयंत विष्णु नार्लीकर की इस रोचक विज्ञान कथा में नियोजित हो गया है।
Author नई दिल्ली | January 18, 2016 21:41 pm
पृथ्वी की सुरक्षा के लिए भारतीय ज्ञानियों की निरंतरता का अद्भुत उदाहरण अनायास जयंत विष्णु नार्लीकर की इस रोचक विज्ञान कथा में नियोजित हो गया है। (फाइल फोटो)

यह सर्वविदित है कि अंग्रेजी की तुलना में भारतीय भाषाओं में विज्ञान कथा का अभाव है। आमतौर पर साहित्य और विज्ञान अलग-अलग क्षेत्र माने जाते हैं। साहित्य में ऐसे लोग अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं जो विज्ञान या तकनीक की पृष्ठभूमि से हैं। जयंत विष्णु नार्लीकर को ऐसे ही विरले कथाकार के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि फंतासी गल्प की शुरुआत बहुत पहले देवकीनंदन खत्री की ‘चंद्रकांता संतति’ जैसी कृति से हो चुकी थी। इस विधा में चमत्कारी कल्पना तत्त्व ज्यादा होता है, जबकि रचनात्मक वैज्ञानिक साहित्य में कल्पना के साथ-साथ अधुनातन तर्कशीलता भी निहित रहती है, जो गल्प-पाठकों को अधिक उपयोगी और अपने परिवेश के ज्यादा निकट लगती है।

जयंत विष्णु नार्लीकर की ‘अंतरिक्ष में विस्फोट’ और ‘वायरस’ उपन्यास मूल रूप से मराठी में लिखे गए थे। ‘अंतरिक्ष में विस्फोट’ की कहानी बच्चों को ध्यान में रख कर बुनी गई है, लेकिन कथ्य में ऐसे अनेक बिंदु हैं जो न केवल देश की सांस्कृतिक धरोहर को निहायत गंभीरता और कलात्मकता से उजागर करके रचना को परिपक्व पाठकों के लिए भी रोचक बना देते हैं, बल्कि विश्व के भावी समय की सुरक्षा के प्रति भारत की सार्थक चिंता को भी जताते हैं।

इसमें लेखक ने अतीत, वर्तमान और भविष्य को सटीक चिंता सहित एक ही धरातल पर स्थापित कर दिया है। पहले काल का दौर हर्षवर्धन के शासन का था, जब सारिपुत्त जैसे विद्वान खगोलशास्त्री सक्रिय थे। उन्होंने उस समय एक धूमकेतु को आकाश में देख कर अपनी गणनाओं से सदियों बाद पृथ्वी पर आने वाले संकट का आभास पा लिया था, क्योंकि अंतरिक्ष में हजारों प्रकाश वर्ष दूर स्थित तारों में हुए विस्फोट का प्रकाश अगर हमें आज दिखाई देता है तो इसका मतलब है कि वह विस्फोट वहां हजारों वर्ष पहले हुआ था। विस्फोट की तीव्रता भले क्षीण हो जाए, लेकिन उससे विसर्जित घातक विकिरण जारी रहते हैं, जो हो सकता है पृथ्वी पर कई हजार वर्ष बाद पहुंचें। उस समय के राजा ने भावी सभ्यता की सुरक्षा के लिए तथाकथित धूमकेतु के विवरण को ताम्रपत्रों पर लिख कर कालपात्र में सुरक्षित रख दिया। 1996 में पुरातत्त्ववेत्ता भागवत की सहायता से वैज्ञानिक अविनाश ने सांकेतिक मानचित्रों का गहन अध्ययन करके न केवल उन्हें खुदाई करके प्राप्त कर लिया, बल्कि खगोलीय संकट को टालने के लिए सुरक्षा की आवश्यक कार्रवाई के बाद समकालीन परिस्थितियों का लेखा-जोखा एक काल-पात्र में आने वाली सभ्यता के लिए दफना कर, पुराने कर्ज का हिसाब भी चुका दिया। फिर 2710 में विनाश के बाद, नए सिरे से अंकुरित हो रही सभ्यता के दादू, रामू, पंपू और सदू जैसे देहाती पात्रों ने उस कालपात्र को वर्तमान राष्ट्रपति भवन वाली उजाड़ जगह से खोज निकाला और फिर से पृथ्वी को नष्ट होने से बचाने की दिशा में पहल शुरू कर दी।

पृथ्वी की सुरक्षा के लिए भारतीय ज्ञानियों की निरंतरता का अद्भुत उदाहरण अनायास जयंत विष्णु नार्लीकर की इस रोचक विज्ञान कथा में नियोजित हो गया है। कभी-कभार हमारे जीवन में ऐसी परिस्थितियां या पात्र अचानक आ जाते हैं, जिनसे सारा मानसिक तंत्र और परंपरागत ढांचा अस्त-व्यस्त हो जाता है। तब उस व्यक्ति या परिस्थिति को ‘वायरस’ की संज्ञा दी जा सकती है।

हिंदी में जयंत नार्लीकर का दूसरा वैज्ञानिक उपन्यास उनके द्वारा ही मराठी से अनूदित ‘वायरस’ शीर्षक से छपा था, जिसमें वायरस वाकई वह रहस्यमय सॉफ्टवेयर है, जो विश्व की संपूर्ण कंप्यूटर प्रणाली को भ्रष्ट करने के लिए किसी अन्य ग्रह के निवासियों द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है। एकाएक जब विश्व के अधिकतर कंप्यूटर गड़बड़ाने लगते हैं, तो वैज्ञानिक मिलजुल कर इसका कारण और निदान खोजने की कोशिश करते हैं। तब पता लगता है कि आकाश के तारों पर नजर रखने के लिए भारत में जो महादूरबीन स्थापित की गई है, उसी के माध्यम से अज्ञात, लेकिन हमारी सभ्यता से कहीं अधिक उन्नत ग्रह की ओर से ऐसे संकेत पृथ्वी की तरफ भेजे जा रहे हैं, जो विश्व की कंप्यूटर प्रणाली में ‘वायरस’ डाल कर उसे इस तरह धीरे-धीरे दूषित कर रहे हैं कि अनजाने ही हम अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मार कर, महाविनाश की ओर बढ़े रहे हैं। यों यह तथ्य अभी प्रमाणित नहीं हुआ है कि दूसरे किसी ग्रह पर जीवन है या नहीं, चंद्रमा और मंगल तक तो मनुष्य खाली हाथ टटोल आया है।

हो सकता है, ब्रह्मांड का गर्भाशय सिर्फ पृथ्वी हो, जहां जीवन पनपता है, पर कहानी का सुखांत यही है कि कारण पता लगते ही समस्या का निदान संभव हो पाता है और पृथ्वी की सभ्यता नष्ट होने से बच जाती है। इन पुस्तकों का कथानक न केवल विश्व-स्तरीय सांस्कृतिक और दार्शनिक धरातल पर सहज ज्ञान को बढ़ाता है, बल्कि सकारात्मक प्रेरणा प्रदान करके, विज्ञान-गल्प की सार्थकता को भी स्थापित करता है।

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