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मूल्यों के बरक्स

दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर चलते हुए मैंने देखा कि एक वृद्ध महिला भूख से तड़प रही है। महिला को खाना खिलाने के बाद जब मैंने उसकी इस हालत का कारण पूछा तो हैरान रह गया।
प्रतीकात्मक चित्र।

हाल ही में एक घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर चलते हुए मैंने देखा कि एक वृद्ध महिला भूख से तड़प रही है। महिला को खाना खिलाने के बाद जब मैंने उसकी इस हालत का कारण पूछा तो हैरान रह गया। दरअसल, महिला ने कर्ज लेकर अपनी सारी संपत्ति इकलौते बेटे की पढ़ाई में लगा दी थी। लेकिन बेटा पढ़-लिख कर शादी के बाद उसे अकेला छोड़ कर विदेश चला गया। तब से वह सड़कों पर भीख मांग कर अपना जीवन व्यतीत कर रही है। मैं उस महिला की स्थिति के बारे में सोच कर परेशान हो रहा था कि अखबार में छपी एक खबर की ओर मेरा ध्यान गया। दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में एक ई-रिक्शा चालक ने जब दो लड़कों को सार्वजनिक स्थान पर पेशाब करने से रोका तो उससे उपजा विवाद इतना बढ़ गया कि लड़कों ने रिक्शा चालक की पत्थरों से पीट-पीट कर हत्या कर दी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस घटना को दिल्ली की एक भीड़भाड़ वाली जगह पर अंजाम दिया गया। अगर लोग मदद करते तो शायद रिक्शा चालक की जान बचाई जा सकती थी, लेकिन लोग तमाशबीन बने रहे।

मनुष्य और अन्य प्राणियों में एक बड़ा अंतर मनुष्य की दिमागी संरचना है, जिसकी वजह से वह भाषाई क्षमताओं के साथ अपना विकास कर पाया है। दिमागी संरचना और भाषाई क्षमताओं के कारण मनुष्य अपने और समाज के लिए जरूरी मानवीय मूल्यों के बारे में सोच-विचार करता है। इसलिए मनुष्य के सोचने और विचार करने के कारण उसकी अन्य लोगों के प्रति जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समूह में रहता है। समूहों से मिल कर ही समाज बनता है। इस

प्रकार समाज और मनुष्य का एक-दूसरे से परस्पर संबंध है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आज कितने लोग समाज के लिए जरूरी मानवीय मूल्यों के बारे में सोचते हैं?
यह रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिलता है कि सड़क दुर्घटना में घायल इंसान की मदद करने के बजाय लोग उसे देख कर आगे बढ़ जाते हैं। बूढ़े माता-पिता सड़क पर जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर हैं, कुछ लोग दहेज के लालच में किसी की जिंदगी छीन लेते हैं। ऐसी घटनाएं आम हैं। हालांकि समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के लिए सरकार ने कठोर कानून बनाए हैं। फिर भी हमारा समाज इन बुराइयों के दलदल में धंसता ही जा रहा है। ऐसा क्यों हैं दरअसल, किसी भी मनुष्य को गलत कदम उठाने से रोकने में उसके मूल्यों का अहम योगदान रहता है, क्योंकि मूल्यों के आधार पर ही वह अच्छा-बुरा और सही-गलत की परख करता है। लेकिन वैश्वीकरण के इस युग में मानवीय मूल्य घटते ही जा रहे हैं। आज ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर और पायलट आदि बनाने की भाग-दौड़ में लगे हुए हैं। शिक्षा संस्थान भी आज की जरूरतों के मुताबिक केवल श्रमिक या कर्मी तैयार कर रहे हैं और दुर्भाग्यवश उनमें मानव मूल्य पोषित नहीं हो पा रहे हैं। इसकी वजह से बच्चों में समाज के लिए जरूरी मानवीय मूल्यों का बोध विकसित नहीं हो पा रहा है।

पहले बचपन में बच्चे अपने माता-पिता और दादा-नानी से किस्से-कहानियां सुनते थे और विद्यालय या घर में मूल्य आधारित धार्मिक और नैतिक शिक्षा हासिल करते थे। लेकिन बदलते दौर ने जहां दादा-नानी के किस्से-कहानियों से बच्चों को दूर कर दिया है, वहीं धार्मिक और नैतिक शिक्षा भी वैश्वीकरण के इस युग में व्यर्थ नजर आने लगी है। हालांकि बदलाव हर दौर की जरूरत होता है, मगर हर बदलाव के साथ अच्छे-बुरे दोनों पहलू जुड़े होते हैं। यह बदलते वक्त का ही प्रभाव है कि बच्चों का जो समय पहले अपने बड़े-बुजुर्गों के साथ गुजरता था, वह अब वीडियो गेम, सोशल नेटवर्किंग साइट और टीवी के साथ गुजरने लगा है। आज के दौर में बच्चों को इस प्रकार की चीजों से दूर रखना बहुत मुश्किल है क्योंकि ये चीजें नई पीढ़ी के लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं।शायद ही हम कभी सोचते होंगे कि रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देने वाले उदाहरणों का हिस्सा हम भी बन सकते हैं और बिना मदद किए गुजरने वाले बच्चे हमारे भी हो सकते हैं। मनुष्य के जीवन की पहली पाठशाला उसका अपना परिवार होता है और उसके बाद उसका विद्यालय, जहां से उसे शिक्षा प्राप्त होती है। परिवार और विद्यालय के अनुरूप ही एक व्यक्ति में सामाजिक गुणों और मानव मूल्यों का विकास होता है। इसलिए आज हमें मानवीय मूल्यों के महत्त्व को समझते हुए उन्हें अपने दैनिक व्यवहार में लाने की जरूरत है ताकि समाज के लिए जरूरी मानवीय मूल्य नई पीढ़ी के व्यवहार में आ सकें।

 

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