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विज्ञापन की विकृत छवियां

हर व्यक्ति या कहें उपभोक्ता तक कंपनी के उत्पादों की खूबियों को इस तरह से पहुंचाना कि वह उस सामान को खरीदने के लिए विवश हो जाए, मार्केटिंग का सार है।
Author October 17, 2015 10:26 am

हर व्यक्ति या कहें उपभोक्ता तक कंपनी के उत्पादों की खूबियों को इस तरह से पहुंचाना कि वह उस सामान को खरीदने के लिए विवश हो जाए, मार्केटिंग का सार है। अब उपभोक्ता को विवश करने के लिए भावुकता का सहारा लेना हो या फिर उसकी जरूरत बताना हो, दोनों ही हथकंडों का इस्तेमाल होता है। अपने ब्रांड के प्रचार के लिए फिल्मी और खिलाड़ी सितारों को कंपनियां मोटे पैसे भी दे रही हैं, क्योंकि इन सितारों को ‘सेलिब्रिटी’ कहा जाता है। दरअसल, आजकल युवा पीढ़ी के चहेते सितारे भी सीधे तौर पर टीवी विज्ञापनों पर ही बात करना ठीक समझते हैं, क्योंकि प्रिंट के विज्ञापन इन दिनों ज्यादातर राजनीतिक छींटाकशी के लिए ही चर्चा में होते हैं।
एक विज्ञापन में अमिताभ बच्चन तनाव दूर करने के लिए ‘नवरत्न’ तेल लगाने की सलाह देते दिखे और महेंद्र सिंह धोनी ‘पेप्सी’ पीने के लिए कह रहे थे। दीपिका पादुकोण ‘तनिष्क’ के आभूषण खरीदने के साथ-साथ एक्सिस बैंक की ग्राहक बनने की सलाह देती हैं।

उधर शाहरुख का कहना है कि मर्दों वाली क्रीम तो जॉन अब्राहम मर्दों वाला डियोड्रेंट लगाने के लिए कहते हैं। यानी हर तरफ सिर्फ ब्रांडिंग का बाजार है। वक्त की मांग कहिए या समय के साथ एक तरह का परिवर्तन, पर यही आजकल बाजार है। यहां तक तो बात समझ में आती है। चूंकि विज्ञापनों को भावुकता और व्यवहार से जोड़ कर दिखाया जाता है, इसलिए महिलाओं की मौजूदगी भी विज्ञापनों में बहुतायत होती है। हालांकि इन दिनों भावनाएं नहीं, जरूरत की दलील परोसी जा रही है। मसलन, एक विज्ञापन में कहा जाता है- ‘तुम पापा को खुश करो, वे तुम्हें खुश करेंगे।’ यह कहते हुए बेटा-बेटी पिता की गाड़ी साफ कर रहे होते हैं। अब इसे कैसे देखा जाए! भावना या लगाव सारी बातें यहां गौण हो गर्इं। भावना, कोमलता, सौंदर्य का पुट देने के लिए महिलाओं की मौजूदगी के साथ विज्ञापन तैयार हो रहे हैं। जैसे एक मां अपने बच्चे की न खाने की आदत से परेशान है और वह बाजार से कुछ लाने की सलाह विज्ञापन में देती है या दफ्तर से घर आए पति के लिए खाना बनाना बताती है।

विज्ञापनों में महिलाओं की मौजूदगी विषय नहीं है, बल्कि हर विज्ञापन में महिलाओं की मौजूदगी ने सवाल उठाए हैं। यह चर्चा का विषय भी रहा है। लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि क्या हर विज्ञापन में महिलाओं की मौजूदगी आवश्यक है! मसलन, पुरुषों के अंत:वस्त्र के विज्ञापन में एक खास भाव में महिला की मौजूदगी क्यों होती है? घर में पहनने वाली एक चप्पल के विज्ञापन में आखिर बिकनी के साथ महिला को क्यों दिखाया जाता है? एक महिला का इस तरह के विज्ञापनों में क्या जरूरत है जो उसके इस्तेमाल या उपभोग की वस्तु नहीं है?

विज्ञापन में महिलाओं को इस तरह से दिखाना आधी आबादी की छवि को एक तरह से बिगाड़ना है। ऐसे विज्ञापनों से आम महिलाओं के प्रति आदर और सम्मान का भाव तो घट ही रहा है, एक अलग तरह की मानसिकता प्रबल हो रही है। लेकिन अब बात इससे ज्यादा हो चुकी है कि महिलाओं को विज्ञापन में उपभोग की वस्तु की तरह पेश किया जाता है।

एक लड़का अगर एक खास क्रीम या डियोड्रेंट लगा ले तो कोई लड़की खुश हो जाएगी! लेकिन अब विज्ञापन यहां सीमित नहीं है। अब यह भी परोसा जा रहा है कि अगर कोई पुरुष किसी खास कंपनी के अंत:वस्त्र पहनता है तो कोई महिला उसके पीछे लग जाएगी! अगर किसी ने एक खास कंपनी का सेंट लगा लिया तो कोई महिला उसे अपने घर बुला लेगी। यह किस तरह के समाज का चित्र है या कैसा समाज बनाने की कोशिश है!

ऐसे विज्ञापन इस तरह के संदेश फैला रहे हैं जो धीरे-धीरे लोगों की मानसिकता में तब्दील हो जाएंगे। विज्ञापन कोई ऐसी चीज नहीं है कि जिसे इंटरनेट पर खोज कर देखना पड़े। यह दिन भर हमारे-आपके घर में दिखता है। जब टीवी चलेगा तो कार्यक्रम कुछ भी हो, विज्ञापन होंगे ही। यही स्थिति बनी रही तो वह दिन दूर नहीं, जब अश्लील वेबसाइटों की तरह विज्ञापनों को भी प्रतिबंधित करने की मांग उठने लगेगी। हालांकि विज्ञापनों को लेकर विवाद और प्रतिबंध के मामले पहले भी आए हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि स्थिति हाथ से निकल रही है।

फिल्मों को लेकर आप यह तय कर सकते हैं कि कोई खास फिल्म देखनी है या नहीं या कौन फिल्म परिवार के साथ देखनी है या अकेले। फिल्मों में शब्दों और दृश्यों को लेकर एक मानक तय किया गया है। लेकिन शायद विज्ञापनों को लेकर व्यवस्था लचर है। आज कई बार ऐसा महसूस होता है कि कुछ विज्ञापनों पर लगाम लगाने की जरूरत है।

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