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दुनिया मेरे आगेः संवेदना की नीधि

जाते-जाते ‘भगवन’ कह गए थे- ‘शाम-शाम लौट आऊंगा, अपने ‘भक्त’ से मिल कर। एकतारा यहीं, तुम्हारे पास छोड़ जाता हूं।’ दोपहर बाद ही निकले थे भगवन, लेकिन शाम क्या, रात हो गई।
Author April 16, 2016 02:29 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

जाते-जाते ‘भगवन’ कह गए थे- ‘शाम-शाम लौट आऊंगा, अपने ‘भक्त’ से मिल कर। एकतारा यहीं, तुम्हारे पास छोड़ जाता हूं।’ दोपहर बाद ही निकले थे भगवन, लेकिन शाम क्या, रात हो गई। न खुद आए, न कोई खबर भेजी। शहर के हालात ठीक नहीं थे। कुछ पहले ही आतंकियों ने चोरी-छिपे, अपनी सीमा पर बने सैनिक ठिकाने पर हमला करके तबाही मचाई थी और कई लोगों की जान ले ली थी। चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था। शहर की सीमाएं सील कर दी गई थीं। ऐसे में भगवन का इतनी रात गए घर नहीं लौटना चिंता की बात थी। एकतारा मेरे बैठने वाले कमरे में दीवार से लग कर खड़ा था। वहीं, जहां भगवन उसे छोड़ गए थे। रात जब ज्यादा गहरा गई और शहर पर सन्नाटे की परतें चढ़ गर्इं तो मेरी चिंता भी बढ़ने लगी। मैंने एकतारे की तरफ देखा। एकतारा शोक में डूबा महसूस हुआ। उससे निकलने वाली खामोश तरंगों ने मुझे विचलित कर दिया। भगवन किसी अनहोनी का शिकार तो नहीं हो गए!

हिम्मत करके मैंने टॉर्च उठाई, एकतारे को अपने कंधे से लगाया और घर से बाहर निकल आया। इस सन्नाटे की रात भगवन को कहां तलाश करूं! फिर भी आगे बढ़ता रहा। रास्ते में जगह-जगह सेना के जवानों ने रोका। एकतारे को शक की आंख से देखा। रात में इस तरह अकेले घूमने की वजह पूछी। धमकी-भरे शब्दों में घर लौटने को कहा। मैं उन्हें भगवन के गुम होने की बात कहता तो मामला शायद कुछ और बिगड़ जाता। इसलिए अपने एक रिश्ते के आदमी की तलाश का बहाना बना कर किसी तरह उनसे मुक्ति पाई।

मैं शहर के बाजार वाले इलाके से होकर भगवन के भक्त की झोपड़पट्टी की तरफ बढ़ा। भक्त की झोपड़ी का पता मुझे मालूम था। सीधे वहीं पहुंचा। भक्त से भेंट हो गई। बैठा-बैठा धीमी आवाज में भगवन के दोहे गा रहा था। मैंने पूछा- ‘भगवन कहां हैं? अभी तक घर नहीं लौटे।’ भक्त की आंखें चिंता में डूब गर्इं। बोला- ‘वे तो कब के यहां से चले गए। कहते थे, किसी खास जगह जाना है। मैंने साथ चलने का आग्रह किया, पर वे नहीं माने। बोले, मुझे अकेले ही जाना है। मैं दिल मसोस कर रह गया। मैंने लाख कहा कि शहर का माहौल खराब है, आपका इस तरह अकेले बाहर निकलना ठीक नहीं। लेकिन वे अपनी जिद पर कायम रहे।’ मैंने भक्त से पूछा- ‘कहां गए होंगे? कुछ कह रहे थे?’ उसने कहा- ‘एक बार सिर्फ इतना बोले, कब्रिस्तान जाना है।’

मैं चकित रह गया। इस शहर में कब्रिस्तान! भगवन कब्रिस्तान किसलिए गए! मैंने भक्त को साथ लिया और आबादी वाले इलाके की तरफ चल पड़ा। रास्ते में कई छोटे-बड़े कब्रिस्तान मिले। सब जगह अंधेरा और सन्नाटा पसरा था। थोड़ा आगे बढ़ा तो भक्त ने मुझे ‘टहोका’ दिया- ‘उधर देखें, कुछ हलचल मालूम होती है!’ यह एक छोटा-सा कब्रिस्तान था, जहां रोशनी के बल्ब जल रहे थे और फौजी पोशाक में कुछ अमले इधर-उधर खड़े थे। उनके बीच भगवन आधी बांह वाली अपनी लहरिया कमीज पहने, कंधे पर गमछा रखे खड़े थे। हमें एक साथ देख कर चौंके, फिर एकतारा अपने हाथों में संभाल लिया।

सामने थोड़ी दूर पर एक ताजा कब्र दिखाई पड़ी। कब्र की ऊपरी सतह फूल-माला से ढंकी थी। सिरहाने, तीन हट्टे-कट्टे देशी नस्ल के कुत्ते खड़े थे। उनके सिर नीचे, कब्र की तरफ झुके थे और आंखों से खारे पानी की बूंदें टपक रही थीं। कोई फौजी अमला उन्हें कब्र के पास से हटाने की कोशिश कर रहा था। मगर वे टस से मस नहीं हो रहे थे।

यह एक विस्मयकारी दृश्य था! भगवन एकतारा लिए उनके पास पहुंचे। सघन ट्रेनिंग पाए तीनों कुत्ते उनसे लिपट कर तेज-तेज आवाज में रोने लगे। उनका चीत्कार सुन कर कब्रिस्तान में मौजूद सब लोगों की आंखें भर आर्इं। हम थोड़ा सरक कर उस फौजी अमले के पास गए और कब्र में दफन ‘जनाजे’ के बारे में जानना चाहा। शोकाकुल आवाज में उसने कहा- ‘वह चार खोजी कुत्तों की टीम का सरदार था। आतंकियों द्वारा बिछाए बारूदी जाल की पहचान करते समय, हमारे जवानों के साथ, वह भी आतंकियों के हमले का शिकार हो गया।

उसके साथ बरसों, खतरों के बीच काम करने वाले उसके ये तीन साथी कई घंटे से इस कब्र के सिरहाने इसी तरह शोक में डूबे खड़े हैं। वे अपने इस टीम-सरदार को कब्र में अकेला छोड़ कर यहां से हिलने को तैयार नहीं। हम उन्हें तमाम कोशिश के बावजूद यहां से नहीं हटा पा रहे हैं।’ बोलते-बोलते फौजी अमले की आवाज भर्रा गई। मेरी आंखें भगवन की तरफ लौटीं। मैंने देखा भगवन की आंखें भीगी हैं। आहिस्ता-आहिस्ता तीनों पट्टाधारी कुत्ते सिर झुकाए भगवन के साथ कब्रिस्तान के बाहरी फाटक की ओर जा रहे हैं! हमें अपने पास खड़ा देख कर भगवन बोले- ‘भक्त! इनसे सीखो। अपने साथ बरसों काम करने वाले सरदार के प्रति हमदर्दी का सबक!’

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