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दुनिया मेरे आगेः प्रकति बनाम आस्था

बुराड़ी और संतनगर से सटा भाग उत्तरी दिल्ली का वह हिस्सा है, जहां यमुना अपने सबसे साफ और खूबसूरत रूप में नजर आती है। उसके दोनों तरफ खेत हैं और आसपास गांव।
Author February 4, 2016 02:42 am
ये है साफ उत्तरी दिल्ली के इलाके वाली साफ सुथरी यमुना नदी

मनोज चाहिल

बुराड़ी और संतनगर से सटा भाग उत्तरी दिल्ली का वह हिस्सा है, जहां यमुना अपने सबसे साफ और खूबसूरत रूप में नजर आती है। उसके दोनों तरफ खेत हैं और आसपास गांव। हर साल सर्दियों की शुरुआत में यहां प्रवासी पक्षी आने लग जाते हैं। अपने दोस्तों के साथ पिछले कई सालों से मौसम के अनुसार मैं नदी के किनारे के नजारे और अनुभव का लुत्फ लेने जाता रहा हूं। जगह की खूबसूरती और सुकून का आलम यह है कि एक तरफ दिल चाहता है कि सब जानने वालों और मित्रों को इसके बारे में बताया जाए, उन्हें घूमने की दावत दी जाए। मगर दूसरी तरफ यह घबराहट होती है कि कहीं इसकी जानकारी फैल न जाए और यहां अक्सर बहुत सारे लोग न आने लग जाएं!

फिर जब से यह सुनने में आ रहा है कि सरकार की योजना इस जगह का टेम्स और साबरमती की तर्ज पर ‘सौंदर्यीकरण’ करके पर्यटन के लिए ‘विकसित’ करने की है, तब से यह डर लग रहा है कि मैं भी इतिहास की एक त्रासदी का गवाह भर होने को मजबूर न हो जाऊं। यों इस तरफ दिल्ली सरकार द्वारा एक वृहद जैविक-विविधता पार्क भी विकसित किया जा रहा है। इसका एक हिस्सा एक प्रांगण से घिरा है, जहां शैक्षिक भ्रमण आयोजित किए जाते हैं, मगर बाकी और बड़ा भाग अभी गांवों के आसपास लोगों के घूमने-बैठने, लड़कों के खेलने, भैंस-बकरियां चराने, उपले बना कर सुखाने, चूल्हों के लिए लकड़ियां बीनने आदि रोजमर्रा के कामों के लिए इस्तेमाल होता है।

हरियाणा से दिल्ली में प्रवेश करने पर यमुना के इस शुरुआती दस-बारह किलोमीटर के हिस्से में यों तो किनारे के कई स्थान आकर्षक हैं, मगर हमलोग अधिकतर उस जगह जाते हैं जिधर जगतपुर गांव के पास का रैंप नंबर दो वाला कच्चा-पक्का रास्ता ले जाता है। यह रैंप एक मंदिर पर जाकर खत्म होता है। करीब साल भर पहले तक यह एक छोटा-सा मंदिर था, मगर अब इसने एक बड़ा रूप ले लिया है। वहीं दो छोटे-छोटे और सुंदर तालाब थे। नदी की खूबसूरती इसके किनारे खेतों में काम करने वाली गांव की महिलाओं, पुरुषों की आवाजाही, इसमें नाव चलाने वाले और मछली पकड़ने वाले लोगों की सामूहिकता से और निखर जाती है।

यह रोचक है कि यहां रहने या काम करने वाले मछुआरे स्थानीय नहीं हैं। यहां खेतों में काम करने वाले लोग नदी के पार जाने के लिए अक्सर एक जुगाड़ तरकीब इस्तेमाल करते हैं। वे दोनों किनारों से बंधी रस्सी को खींचते हुए नाव को आर-पार ले जाते हैं। यहीं मैंने पहली बार एक महिला को नाव चलाते देखा था। यहां अधिकतर मछुआरे बिहार और कुछ उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के हैं। वैसे कुछ शौकिया मछली पकड़ने वाले भी आते हैं जो किनारे पर कांटा डाल कर यह अनुशासित काम करते हैं। जबकि मछुआरों के पास अपनी नावें और बड़े-बड़े जाल हैं। पूछने पर पता चला कि दोनों ही तरह के लोगों को प्रशासन से लाइसेंस लेने की जरूरत होती है। पहले दोनों तालाबों के किनारे बैठ कर भी कुछ लोग मछली पकड़ते थे। मगर यह सुंदर चित्र अब छिन्न-भिन्न हो चुका है।

कुछ माह पहले वहां एक मंदिर को विशाल रूप दिया गया था। धीरे-धीरे वहां एक अखाड़े और गौशाला के नाम की जगह घेर ली गई और खेत की तरफ के रास्ते को पहले के मुकाबले अवरुद्ध कर दिया गया। जाहिर है, नदी किनारे होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों-आयोजनों की संख्या भी बढ़ गई होगी, क्योंकि अब वहां पहले की तुलना में अधिक मात्रा में पूजा-पाठ से जुड़ी सामग्री बिखरी नजर आती है। कुछ समय पहले जब मैं वहां गया तो तालाबों की जगह मिट्टी-पत्थर के ढेर और उसमें एक सनी हुई नाव दिखाई दी, जिसे बाद में कुछ लोग बड़ी मुश्किल से साफ करके निकालने की कोशिश करते दिखे। मैंने वहां एक-दो गांव वालों से तालाबों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मंदिर के पास मछली पकड़ने के काम को रोकने के लिए तालाबों को पाट दिया गया। यह सब आजीविका के लिए उन तालाबों पर निर्भर लोगों को बताए बगैर अचानक किया गया, लोग न विरोध कर पाए और न अपना सामान बचा पाए।

इस अनुभव ने कई सवालों पर सोचने पर मजबूर किया। आखिर यह कैसी सामाजिकता है जो कुछ लोगों को दूसरे लोगों की आजीविका, उनके शौक को कुचल देने की सोच और ताकत देती है? यह अहिंसा की कौन-सी चिंता है जो कुछ मछलियों की जान बचाने के पीछे तालाबों और उनमें पल रहे असंख्य जीवों और उनके जीवन-चक्र को ही नष्ट कर देती है? यह कैसी पवित्रता है जो खुद न उत्पादन करती है और न मेहनत, लेकिन श्रम करने वालों के काम, उनके जीवन को कमतर घोषित करती है? प्राचीनता की श्रेष्ठता सिद्ध करने की यह विचित्र ग्रंथि है, जिसे अपने व्यावसायिक, कर्मकांडी और सार्वजनिक स्थलों को कब्जाते पूजा-स्थलों के आगे तालाबों और आदिम जीवनयापन करने वालों की ऐतिहासिकता नजर नहीं आती!

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