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‘दुनिया मेरे आगे’ कॉलम में रक्षा मेहता का कॉलम : चढ़ावे के बरक्स

शेक्सपियर ने मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना कहा है। लेकिन भक्ति के मद में भ्रमित हम सबने मनुष्य को गौण और उसके हाथों बनाए गए धर्मस्थलों और मूर्तियों को प्राथमिक बना दिया है।
Author नई दिल्ली | July 5, 2016 01:04 am
भगवान शिव की तस्वीर

सावन के महीने में शिव मंदिरों में भक्तों का तांता लगा रहता है। यों, मैं मंदिरों में बहुत कम जाती हूं, खासकर तीज-त्योहारों पर मंदिर जाना तो मुझे बिल्कुल नहीं ठीक लगता है। कारण यह है कि भीड़-भरे मंदिरों में मेरा ध्यान ईश्वर-भक्ति में कम और खुद को धक्का-मुक्की से बचाने में अधिक लगा रहता है। मन ईश्वर के ध्यान से ज्यादा अपनी बारी आने की प्रतीक्षा में अधिक लगा रहता है। हालांकि इस संबंध में सबकी अपनी-अपनी राय है।

बहरहाल, पिछले दिनों कम भीड़ होने के खयाल से शहर से दूर के एक मंदिर में चली गई। विशाखापट्टनम में स्थित यह मंदिर बेहद खूबसूरत है और दक्षिण-भारतीय शैली में निर्मित है। जब अंदर गई तो देखा कि यहां भी श्रद्धालुओं का रेला लगा है। कतार में खड़े अनेक लोग शिव के अनन्य भक्तों की श्रेणी में अपना नाम लिखवाने के लिए भारी-भरकम सामग्री ढो रहे थे। दरअसल, भगवान को अर्पित करने के लिए लोग भारी मात्रा में दूध, दही, घी, शहद, चीनी आदि लाए थे। शिवलिंग के नीचे एक बड़ा-सा पात्र रखा हुआ था, जिसमें अर्पित की जाने वाली सामग्री गिर रही थी और पात्र के भर जाने के बाद उस बहुमूल्य सामग्री को पास के एक नाले में बहाया जा रहा था। यह दृश्य देख कर मेरा हृदय अफसोस से भर गया।

हम सबका यही मानना है कि जिन खाद्य पदार्थों को शिव को अर्पित किया जाता है, वे उन तक पहुंचते हैं और वे उनका सेवन करते हैं। लेकिन मैंने उस मंदिर में जो देखा, वह सच इस धारणा की गवाही नहीं देता। दूसरी ओर, इस देश में लाखों ऐसे लोग हैं जो कई बार भूखे पेट सोते हैं। यहां तक कि उन्हें पीने के लिए साफ पानी भी नसीब नहीं होता। मंदिर की सीढ़ियों पर ही सैकड़ों की संख्या में ऐसे लोग बैठे रहते हैंं जो अपने अंगों से लाचार होने के कारण पेट की क्षुधा शांत करने में असमर्थ होते हैं। हममें से कितने लोगों का ध्यान उनकी ओर जाता है? हम अपनी मस्ती में ईश्वर के खयालों में डूबे मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते रहते हैं और वहां चढ़ावा और अपने सामर्थ्य के मुताबिक दक्षिणा देकर तृप्त होते रहते हैं। हमें ऐसा लगता है कि ईश्वर इन सभी कर्मकांडों से खुश होते होंगे। लेकिन क्या वास्तव में ईश्वर के हृदय का मार्ग उनके पेट से होकर जाता है?

शेक्सपियर ने मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना कहा है। लेकिन भक्ति के मद में भ्रमित हम सबने मनुष्य को गौण और उसके हाथों बनाए गए धर्मस्थलों और मूर्तियों को प्राथमिक बना दिया है। हालांकि हम सब आज अत्याधुनिक होने का दम भरते हैं, लेकिन आधुनिकता के आवरण में छिपे मनुष्य की वास्तविक शक्ल तीज-त्योहारों में मंदिरों में जाकर देखी जा सकती है। आधुनिकता ने हमें सिखाया कि मनुष्य प्रधान है। उसी ने पत्थरों में मूर्तियों को तराश कर ईश्वर को बनाया।

मनुष्य समान है, चाहे वह धनी हो या निर्धन, किसी भी जाति का। सबसे पहले वह मनुष्य है। लेकिन निरीह, विवश और लाचार मनुष्य के प्रति परोपकार की भावना को मार कर ईश्वर के प्रति भक्ति-भाव दिखाने की हमारी इस प्रवृत्ति ने हमें आधुनिकता के किस चरण पर लाकर खड़ा कर दिया है! ऐसे श्रद्धालुओं की कमी नहीं है जो भगवान को स्वर्ण मुकुट और हार आदि चढ़ा कर अपनी अथाह भक्ति का परिचय देते हैं। लेकिन निर्धनों और शोषितों को देख कर नाक-भौं सिकोड़ने से नहीं चूकते। ऐसे भक्तों के पास यह सोचने तक का समय नहीं है कि क्या अपने हृदय की भावनाओं को ईश्वर तक पहुंचाने का एकमात्र साधन धर्मस्थलों में दान देना ही है? क्या मनुष्यता का परिचय देने के लिए धार्मिक कर्मकांड ही अंतिम विकल्प हैं? दुखी, जरूरतमंद, असहाय और विवश जनता की सहायता करना क्या सच्ची मानवता का परिचायक नहीं है? ईश्वर को ‘भक्त-वत्सल’, ‘अनादि’, ‘अनंत’, ‘अंतर्यामी’, ‘पालनकर्ता’ जैसे नामों से अभिहित करने के बावजूद हम उसे अपने द्वारा लगाए गए भोग पर आश्रित क्यों मानते हैं? कभी ग्यारह, कभी इक्कीस, इक्यावन तो कभी एक सौ एक किलो दूध मंदिरों में बहाने से पहले क्या हमें ऐसे गरीब लाचारों को याद नहीं करना चाहिए जो इन वस्तुओं के सेवन तो क्या, दर्शन को भी तरसते हैं? मंदिरों में फैले और नालियों में प्रचुर मात्रा में बहते दूध और दही की बर्बादी को देख कर किसे खुशी होती होगी?

धर्म-स्थलों के अलावा भी संसार में अनेक ऐसे स्थल हैं जहां जाकर दान-दक्षिणा करने से मन को शांति प्राप्त हो सकती है। वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम जैसी जगहों पर दान करने वालों की संख्या मंदिरों में दान करने वालों की अपेक्षा बहुत कम है। मेरा मानना है कि अगर ईश्वर कहीं है तो उसका कोई पेट नहीं है। अगर हमारे पास क्षमता है तो हमें अन्न और धन का प्रयोग केवल वहीं करना चाहिए, जहां उसकी आवश्यकता है।

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