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सुकून की खोज

दरअसल, जीवन को जानने के लिए आदमी को जीवन के बीहड़ में कूदना पड़ता है। हर कदम पर आगे बढ़ना पड़ता है। रुकना यहां मना है। जो रुक गया, वह कहीं का नहीं रहा..
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

वह इंतजार की घड़ियां गिन रहा है। जैसे उसके गिनने भर से वह सब हो जाएगा या वह दिन आ ही जाएगा। वह एक दिन यों ही चला आ रहा था कि पूछ बैठा, भाई कब आ रहे हो। वह कुछ समझ पाता कि सब उससे मिलने आ गए। वह तो सोच में पड़ गया कि यह सब क्या हो रहा है। कैसे सब कुछ मिल रहा है, जिसकी वह कल्पना करने से भी दूर था। एक वर्ग वह भी है जो चाहता है कि दूसरे कर रहे हैं, तो उनको कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। उनका काम इसी तरह चलता है। ये लोग हमेशा इस ताक में रहते हैं कि कौन क्या कर रहा है और उस हिसाब से ये अपने काम को लेकर आ जाते हैं। आप कुछ भी करने वाले हों कि वे भी आ जाएंगे। कहेंगे कि मेरा भी यह काम है, इसी के साथ हो जाए तो अच्छा रहेगा! उनके ‘अच्छे’ के लिए आप परेशान हों तो अपनी बला से!

जाहिर है, बात के लिए यह जरूरी है कि आपकी बात में जान हो। यानी कुछ कहने से कुछ हो जाता हो या आपकी बात असर करती हो। यह असर करना भी दवा जैसा ही है। जिस किसी की दवा असर करती है उसी के पास हम भाग कर जाते हैं। कहा भी जाता है कि जिसका मर्ज है, वही दवा उतारेगा। विरहिन मीरा कहती है- ‘कोई मेरे वैद्य को बुलाओ!’ मीरा का वैद्य मोहन मुरली वाला श्याम है। उसी से मीरा के मन को शांति मिलती है। यह सब मन माने की बात है। मन की और जीवन की भी। जिसको वैद्य की दवा चाहिए, वह वैद्य के यहां से लाए।
जीवन को समझने के लिए किसी की जिंदगी के इतिहास में जाना जरूरी है। इतिहास से सीखने को मिलता है कि किस बात का क्या असर जिंदगी में पड़ता है। बातों का सिलसिला इतिहास की सबसे सुंदर कहानी है। हर बात एक दूसरी बात से जुड़ जाती है। जहां कुछ भी नहीं होता, वहां कोई इतिहास नहीं होता। आदमी अपने होने में ही इतिहास बनाता रहता है। इतिहास इसी तरह हम सबके जीवन में घुला होता है। यह जिंदगी का सच होता है। सच में पूरा युग समाया होता है। जो यहां होता है, वही जीवन में और घटनाओं के बीच होता है। सच के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। बस एक बार खुली आंख से जिंदगी को देखना होता है। सच को जान कर ही आदमी इतिहास को समझता है। इस क्रम में जीवन को बहुत गहराई से जान पाते हैं।

दरअसल, जीवन को जानने के लिए आदमी को जीवन के बीहड़ में कूदना पड़ता है। हर कदम पर आगे बढ़ना पड़ता है। रुकना यहां मना है। जो रुक गया, वह कहीं का नहीं रहा। सब एक किनारे पर छोड़ कर चल देते हैं। पर जब वही आदमी संघर्ष करता है तो सभी साथ देते हैं। जीवन कभी आसान नहीं रहा, कठिनाइयां जिंदगी में चलती रहती हैं, इन सबके बीच ही जीवन को समझने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस क्रम में जो आगे आता है, वही बढ़ता है। आगे बढ़ना ही आदमी का काम है। आदमी का इतिहास इसी तरह चलता है।

जीवन-पथ पर जब आदमी चलना ही नहीं चाहता, तो बातें बनाता रहता है। इस तरह के लोगों से संसार भरा पड़ा है। वह तो बस इधर-उधर की बातों के सहारे चलना चाहता है। क्या जीवन ऐसे ही चलता रहेगा या इस जीवन में कुछ हमारे हिसाब से भी होना चाहिए? जीवन को किसी एक किनारे से नहीं समझा जा सकता। वह ऐसे ही खेलता रहता है। जब देखो वह जीवन के किनारे से ही निकल जाता है।

जीवन में छांव हमेशा सुकून के कारण ही मिलती है। यह सकून बाजार में नहीं मिलता। बाजार से बहुत दूर जीवन में अपने लोगों के बीच सकून और छाया दोनों होते हैं। यहां जीवन धड़कता है, इसी जीवंत स्पंदन के सहारे हम सब चलते रहते हैं। जब सुकून गायब हो तो दो-चार दिन परिवार में घूम आइए, सब ठीक हो जाएगा। यह सुकून परिवार की छाया और अपने नागरिक संबंधों के साथ जन्म लेती रहती है। यहां हम कभी अकेले नहीं होते। सबके साथ में जीवन की जटिल से जटिल प्रक्रिया भी आसान-सी हो जाती है। यानी सुकून के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं। वह हमारे जीवन और घर में ही होता है।

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