June 29, 2017

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दुनिया मेरे आगेः अनेकांत की राह

सब जानते हैं कि श्रमण भगवान महावीर ने ‘अनेकं त दर्शन’ की उद्भावना की थी। उस काल में अनेक मत-मतांतरों के बीच गहरे तनाव थे।

Author April 8, 2017 05:10 am

शुभु पटवा

सब जानते हैं कि श्रमण भगवान महावीर ने ‘अनेकं त दर्शन’ की उद्भावना की थी। उस काल में अनेक मत-मतांतरों के बीच गहरे तनाव थे। उनसे न के वल सामाजिक समरसता का ध्वंस हो रहा था, बल्कि क ई तरह के क थित चमत्कारों के जरिए आम जीवन भी दुष्प्रभावित हो रहा था। भगवान महावीर ने तभी अनेकांत दर्शन की बात क ही। धीरे-धीरे अनेकांत दर्शन की दार्शनिक और सैद्धांतिक मीमांसाएं भी सामने आने लगीं। ‘भारतीय मानस’ पर इसक प्रभाव भी नजर आने लगा और दर्शन की दुनिया में अनेकांत को विमर्श का मुद्दा भी माना गया। आज हम पाते हैं कि ‘अनेकांत दर्शन’ को दर्शन-जगत का प्रमुख अंग मान क र विद्वत-समाज इस पर विचारवि मर्श क रता है। पर इस सच्चाई को भी स्वीकार क रना चाहिए कि अनेकांत दर्शन को लेक र अभी भी हमारी ‘मनीषा’ में अलग-अलग तरह के संशय मौजूद हैं। ‘अनेकांत दर्शन’ की यह विराटता सर्वमान्य है कि यहां कि सी भी विचार या दर्शन के खंडन की बात नहीं की जाती। महावीर क हते हैं- ‘दूसरों के प्रति ही नहीं, उनके विचारों के प्रति भी अन्याय मत क रो। अपने साथ-साथ दूसरों को भी समझने की चेष्टा क रो।’ यानी वे अनेकांत दर्शन को मात्र बौद्धिक विमर्श तक सीमित रख क र नहीं देखते थे, बल्कि जीवन-व्यवहार में भी

उतरता हुआ देखना चाहते थे। आज मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा संक ट आग्रह-मुक्त नहीं हो पाना ही है। आग्रह मनुष्यता का स्वाभाविक गुणधर्म बनता जा रहा है। ठीक इसके
विपरीत अनाग्रह उसकी विवेक शीलता का परिचायक भी है। वास्तव में मनुष्य होने का अर्थ भी अनाग्रह में ही निहित है। लेकि न हम यह भी देखते हैं कि क ई बार व्यक्ति
दुराग्रही हो उठता है और उसका ऐसा दुराग्रह समरसता का ध्वंस भी क र डालता है। ऐसी विभाजक रेखा भी खड़ी हो जाती है, जो क ई बार विखंडन का सबब भी बन जाती है। स्वस्थ समाज के लिए इससे बचना जरू री है। ऐसा तभी संभव हो सक ता है, जब हम अनाग्रह के स्वर को विक सित क रते चले जाएं। इस दृष्टि से आग्रह-अनाग्रह और दुराग्रह के
अंतर क ो समझना जरू री है।

सामान्य तौर पर आग्रहयुक्त बात क रना एक प्रकर से ‘ठोस’ मत की श्रेणी में माना जाता है। जबकि माना यह जाना चाहिए कि तथ्यपरक ता के साथ तर्क पूर्ण तरीके से क ोई मत जब रखा जाए तो उसमें ‘हठ’ या ‘जिद’ नहीं देखा जा सक ता। यह समझना चाहिए कि जो-कु छ क हा जा रहा है, वह आधारयुक्त है। विवेक वान लोग ऐसी बात का सम्मान क रते हुए उसे विचारणीय मत मान क र सोचते हुए भी देखे जा सक ते हैं। आग्रह और अनाग्रह के स्तर पर ऐसे कि सी विखंडन की आशंकां तभी तो नहीं रहती। लेकि न दुराग्रह की स्थिति इससे सर्वथा भिन्न होती है। सामान्य समरसता के भंज का खतरा सदा दुराग्रहों में ही होता है। दुराग्रह के पीछे तर्क संगतता ठोस आधार और तथ्यपूर्णता क भी नहीं रहते
हैं। इसीलिए इसे व्यर्थ या अनुचित आग्रह क हा जाता है। इसीलिए इसे स्वीकार क रना सामान्य रू प से मुमकि न नहीं रह पाता। इससे हानि भी उठानी पड़ सक ती है। सामाजिक स्तर पर दुराग्रह के लिए कोई जगह भी नहीं होती। फि र भी यह पाते हैं कि ऐसे दुराग्रही मतों से हम और हमारा समाज आज मुक्त नहीं है। आज के संदर्भ में यह संक ट काफी बड़ा है।

तभी बहुत बार इसके प्रतिकू ल प्रभावों को झेलने के लिए भी हमें विवश होना पड़ता है। हम क ह सक ते हैं कि ऐसे दुराग्रहों के दंश लंबे समय तक सहने भी पड़ते हैं। यह भी सवाल उठ सक ता है कि दुराग्रह, आग्रह और अनाग्रह में निर्णायक क ौन हो। निजी तौर पर ऐसे सवालों को अगर हम टालते जाएं, जो कि अक्सर होता ही है, तो यह ‘मर्ज’ को बढ़ाते जाने क ा क ाम ही होगा। आखिरकार इसका असर सामाजिक स्तर पर नजर आने लगेगा। इसे आज देखा भी जा सक ता है। बात चाहे निजी हो या सामाजिक , इसे टाला नहीं जाना चाहिए। एक निर्णायक स्थिति तो आनी ही चाहिए। अगर हम अपनी ‘मेधा’ का उपयोग सम-सामयिक जटिलताओं के समाधान के लिए क रें और उसी में से रास्ते तलाशने
क ी बात सोचें तो श्रमण भगवान महावीर ने अपने समय में जो सोचा, वह पूरा हो सक ता है। हमारी मनीषा के सम्मुख यह एक चुनौती है कि हमारी दार्शनिक विचारधाराओं में से हम वे तत्त्व निक ालें जो वर्तमान की जटिलताओं के बरक्स समाधायक सिद्ध हो सकें । हमारी मनीषा को महात्मा गांधी के निम्न शब्दों के साथ यह चुनौती स्वीकार क रनी चाहिए- ‘तुम्हारे ज्ञान क ी क ीमत तुम्हारे कामों से होगी। पुस्तकें मस्तिष्क में भरने के बजाय उस ज्ञान को व्यवहार में उतारने पर ही उसका मूल्य होता है।’ वाणी और व्यवहार के समन्वयक श्रमण भगवान महावीर की इसी नौ अप्रैल यानी चैत्र शुक्ल तेरस को 2616 वीं जयंती है। उनकी जयंती पर हम दुराग्रह से मुक्त होते हुए आग्रह और अनाग्रह क ी समन्विति के साथ अगर अनेकांत के मर्म क समझें और उसे जीवन-व्यवहार का अंग बनाएं तो महावीर का वास्तविक स्मरण सिद्ध हो सके गा।

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First Published on April 8, 2017 4:46 am

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