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चौपालः दोमुंहा समाज

आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसकी हकीकत किताबों में वर्णित आदर्शों से बहुत अलग है।
Author October 27, 2017 02:14 am

आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसकी हकीकत किताबों में वर्णित आदर्शों से बहुत अलग है। हमारी किताबें नैतिकता की केवल बात करती हैं जिसका समाज में न कोई महत्त्व है और न कोई जगह। कदम-कदम पर पाखंड का वर्चस्व है। सभी प्राणियों को अपने जैसा समझ कर जीव- दया, अहिंसा और करुणा के सुसंदेशों की पताका फहराने वाले हमारे देश के लोगों में संवेदनशीलता लुप्त होती जा रही है। क्या यह विडंबना नहीं कि सड़क पर एक-डेढ़ घंटे तक घायल पड़े व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए तो किसी के पास समय नहीं है लेकिन दस मिनट खड़े होकर उसका वीडियो बनाने का समय सबके पास है। क्या हमारी आत्मा खुद को धिक्कारती भी नहीं है? क्या हमारे अंदर इंसानियत या संवेदना की आखिरी बूंद तक सूख चुकी है? हमारा समाज नारी सशक्तीकरण की बड़ी-बड़ी बातें बघारते हुए दुर्गा, पार्वती आदि माताओं के रूपक तो बना देता है मगर किसी स्त्री के साथ जब कोई अप्रिय घटना घटती है तो सारा दोष उसी पर मढ़ दिया जाता है। यही समाज इतनी घृणा भरी नजरों से देखता है कि उसे स्वयं के नारी होने पर ही अफसोस करना पड़े।

क्या यह दोमुंहा समाज नहीं है? कहीं घर से बाहर बीच सड़क पर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को पीटता है तो यह मूक-बधिर समाज महज इतना कह कर पल्ला झाड़ लेता है कि यह इनका पारिवारिक मामला है, हम बीच में क्यों पड़ें! लेकिन दूसरी तरफ किसी सार्वजनिक जगह पर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को बांहों में लेता है या उससे प्रेम करता है तो लोगों की त्यौरियां चढ़ जाती हैं। तब यह मूक-बधिर समाज अपनी चुप्पी तोड़ देता है कि ये क्या अश्लीलता फैला रखी है, हमारे बच्चों पर कितना गलत प्रभाव पड़ेगा, आदि-आदि।

सवाल है कि हमारी सोच में इतना फर्क और इतना दिखावा क्यों है? एक तरफ जहां हम तमाम आदर्शों की बात करते हैं मगर दूसरी तरफ सारे आदर्शों को ताक पर रख कर दूसरों से छल-कपट करते हैं। तमाम सूक्तियां या अनमोल विचार, जिनका प्रयोग हम दूसरों को उपदेश या सलाह-मशविरा देने के लिए करते हैं यदि उनका प्रयोग अपने नित्य व्यवहार में करें तो समाज का उत्थान हो सकता है। यह समाज हम सबसे मिल कर बना है। हम इस दोमुंहे समाज की महज इकाई हैं। इसमें बदलाव की अत्यंत जरूरत है। यह तभी बदलेगा जब मैं बदलूगी और बदलेंगे आप!
’गुलअफ्शा, आंबेडकर कॉलेज, नई दिल्ली

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