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दुनिया मेरे आगेः संवेदना का हाशिया

बचपन की एक धुंधली याद ताजा हो गई उस विज्ञापन को देख कर। छह सात बरस की रही होऊंगी। गरमी के दिन थे और मैं मां के साथ घर के बाहर चबूतरे पर खड़ी थी।
Author October 1, 2016 02:41 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

बचपन की एक धुंधली याद ताजा हो गई उस विज्ञापन को देख कर। छह सात बरस की रही होऊंगी। गरमी के दिन थे और मैं मां के साथ घर के बाहर चबूतरे पर खड़ी थी। दो ट्रांसजेंडर सामने से गुजर रहे थे। उनमें से एक ने निहायत ही शालीनता से मां से कहा- ‘बहनजी पानी पिला दीजिए!’ मां अंदर जाकर ठीक उसी तरह तश्तरी में पानी रख कर लाई, जैसे कि वे मेहमानों को देती थीं। उनके पानी पीकर जाने के बाद मैंने मुंह बना कर कहा- ‘तुमने इन्हें पानी पिला दिया?’ तो मां ने प्रतिप्रश्न किया- ‘क्यों ये मानुष नहीं हैं क्या?’
बचपन में मेरे भीतर वह कौन-सा भाव था, जिसने मुझे इन ट्रांसजेंडरों को अपने से भिन्न समझने पर मजबूर किया। याद है, उस समय तक केवल इनको यहां-वहां नाचते-गाते ही देखा था शादी-ब्याह, मुंडन या शिशु के जन्म पर। जहां मोहल्ले में इनकी ढोलक की थाप सुनाई देती थी, वहीं बाल मंडली कौतुक के साथ हाजिर हो जाती थी। यहां तक कि मेरे जन्म पर मुझसे चार साल बड़ी बहन घर के पास से उन्हें गुजरता हुआ देख कर उन्हें खुद ही बुला लाई थी कि ‘मेरे घर पर नहीं नाचोगे, मेरी बहन हुई है?’ और जब लड़की के जन्म पर वे दो-तीन गीत पर नाच कर और एक शगुन का गाना गाकर बैठ गए, तब उसने खासा ऐतराज किया था कि ‘इतना-सा ही नाचोगे’, तो पिता ने हंसते हुए कहा था कि ‘जितना ये कहे उतना नाच लो।’ और वे झमाझम नाचे और कहा कि पहली बार लड़की होने पर ऐसा नाचे हैं। ये किस्सा तो मैं बचपन में भी बहुत बार सुन चुकी थी, फिर भी यह कुछ भय मिश्रित हिकारत का भाव मन में क्यों था? यह मालूम नहीं!

शायद गाने-बजाने के बाद इनके मांगने के तरीके को देख कर ऐसा हुआ होगा। लेकिन मां की उस बात ने तब भी मेरे बाल मन को सोचने पर मजबूर किया था। लिहाजा, हाल ही में जो विज्ञापन देखा वह भले ही किसी चाय का था, लेकिन उसने मुझे वे बातें याद दिला दीं। उस विज्ञापन में एक युवती सामने से आते एक ट्रांसजेंडर को देख कर नाक-भौं सिकोड़ती है और उसके पास से ऐसे गुजर जाती है, जैसे कोई किसी गली में किसी आवारा पशु के पास से बच कर निकलता है। आगे उस युवती के साथ कुछ लड़के छेड़छाड़ करते हैं तो वही ट्रांसजेंडर आकर उन लड़कों से भिड़ कर उसे बचाता है। तब पार्श्व में गायक निहायत खुबसूरती से गुरबानी का पाठ गाता है- ‘अव्वल अल्ललाह नूरे पाया कुदरत के सब बंदे…’, फिर वह युवती उस ट्रांसजेंडर के गले लगती है जो महिला के वेश में है और साथ बैठ कर चाय पीती है। सचमुच हृदय-स्पर्शी था, मन को छू लेने वाला।

समाज से उन्हें अलग कर देने की मुहिम कब शुरू हुई यह तो पता नहीं, लेकिन महाभारत की कथाओं में शिखंडी जैसे योद्धा और अर्जुन के वृहन्नला का रूप धरने की कथा यह घोषित करती है कि समाज में इनका सम्माननीय स्थान था। लेकिन वर्तमान में समाज का इनके प्रति जो रवैया रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। इनके लिए अक्सर प्रयोग किया जाने वाला शब्द ‘किन्नर’ (किम नर) तो इनके मनुष्य होने पर ही प्रश्न चिह्न लगाता है। ट्रांसजेंडर होना उनका अपना चुनाव नहीं है। वह कुदरत की देन है। समाज का रवैया उनके प्रति वही रहा है जो विज्ञापन में प्रारंभ में दिखाया गया है, नाक-भौं सिकोड़ने वाला। लेकिन अब यह अनायास ही नहीं है कि वर्तमान में कई जगह ‘तृतीय लिंग’ कहलाने वाले अपनी एक ठोस जगह बनाते दिख रहे हैं, चाहे वह अधिकार की बात हो या साहित्य की। यह प्रयास सरकारी और गैर-सरकारी, दोनों क्षेत्रों में जारी है। संघ सेवा आयोग के आवेदन में ‘जेंडर’ वाले कॉलम में तीसरा विकल्प दिया गया है तो हाल ही में कुछ संगठनों के जरिए इनके लिए जागरूकता का अभियान चलाया जा रहा है। यह तृतीय लिंग अपने प्रति खुद भी जागरूक हो रहा है।
साहित्य में ‘मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी’ जैसी आत्मकथा से लेकर ‘तीसरी ताली’ और ‘नाला सोपारा’ जैसे हिंदी उपन्यास के साथ साथ क्षेत्रीय भाषाओं में भी कुछ आत्मकथाएं और लेख तृतीय लिंग की व्यथा कथा को लेकर लिखे गए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि समाज हिकारत का भाव छोड़ कर इन पर सोचने को मजबूर हो रहा है। टेलीविजन से लेकर स्कूल असेंबली में अपनी पहचान को सरेआम करने और पश्चिम बंगाल के एक कॉलेज में प्रधानाध्यापक पद पर तृतीय लिंग की उपस्थिति ने समाज का ध्यान केवल कानून और संविधान के बाहर इन पर केंद्रित किया है। मगर संविधान और राजनीतिक स्तर के प्रयास से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है इनकी सामाजिक स्वीकृति। ‘पोस्ट बॉक्स नंबर 203 नाला सोपारा’ का प्रधान पात्र विनोद कहता है- ‘जननांग विकलांगता बहुत बड़ा दोष है। पर इतना बड़ा नहीं कि तुम धड़ का वही निचला हिस्सा हो!’

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First Published on October 1, 2016 2:41 am

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